39. संसद सदस्य का आचरण विषयक संकल्प - Page 79

62 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

किया जाना है। मैं आपके विनिर्णय की आलोचना नहीं कर रहा है (व्यवधान)। अवश्य ही मेरे मित्र कुर्सी पर बैठ सकते हैं किंतु इसी क्षण मैं उनके निर्वचन को स्वीकार नहीं करता हूँ। महोदय, हमें सावधानीपूर्वक अपना मस्तिष्क लगाना है क्योंकि हम भविष्य में मार्गदर्शन के लिए पूर्वोदाहरण अधिकथित कर रहे हैं। मेदी दिलचस्पी उस दृष्टि से है न कि मामले के गुणावगुण की दृष्टि से। संसदीय समिति ने इस मामले पर अधिक समय देते हुए और अत्यधिक शक्ति से सविस्तार विचार किया है। किस उद्देश्य से? ताकि इस संपूर्ण प्रश्न की जांच की जा सके, चर्चा हो सके से इसके विनिश्चित किया जा सके। माननीय सदस्य ने अपना कथन रखने के बाद सीधे ही त्याग-पत्र दे दिया और सदन छोड़कर चले गए। प्रश्न यह है कि क्या आप यह आधार लेते हैं कि जब एक बार कार्यवाही प्रारंभ हो जाती है तो उसमें कभी बाधा उत्पन्न नहीं की जा सकती, अथवा यदि संबद्ध व्यक्ति के किसी स्वैच्छिक कार्य के कारण; या दुर्घटना अथवा मृत्यु के कारण उस व्यक्ति को दृश्य से हटा दिया जाता है तो क्या कार्यवाही चालू रहेगी। अपना विनिर्णय देने से पूर्व आप इस मामले पर सावधानीपूर्वक विचार करें क्यों कि यह एक महत्वपूर्ण निर्णय है। इस संसद के इतिहास में आप पहली बार नज़ीर रख रहे हैं, जो भविष्य के लिए मार्गदर्शक होगी।

डॉ. अम्बेडकर : आपकी इजाजत से मैं एक या दो शब्द इसमें जोड़ता हूँ जैसा

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मैंने पहला कहा था, क्योंकि मैं यह महसूस करता हूँ कि संभवतः मेरा वक्तव्य बिल्कुल भी इतना पूर्ण नहीं है जितना यह होना चाहिए। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि मेरे माननीय मित्र पंडित मैत्रा ने यह प्रश्न उठाया है, मैं सोचता हूँ, इस मामले की बाबत हमारे मस्तिष्क का स्पष्ट होना वांछनीय है। कया मेरे माननीय मित्र मुझे क्षमा करेंगे, मैं मामले को कुछ तकनीकी विधिक रीति में रखूंगा और वह इस प्रकार है। जब किसी सदस्य पर विशेषाधिकार के भंग का आरोप है और कार्यवाहियों के समाप्त होने से पूर्व ही वह त्याग-पत्र दे देता है तो क्या यह ऐसा मामला है जिसमें उस पर संसद की अधिकारिता खत्म हो गई है क्योंकि उसने त्याग-पत्र दे दिया है। मैं सोचता हूँ हमें इसी प्रश्न पर विचार करना है और वही प्रश्न है जो मेरे माननीय मित्र ने उठाया है, यद्यपि उन तकनीकी शब्दों में नहीं। उस प्रश्न का उत्तर यह है कि अवमानना के लिए, लोगों को सजा देने के लिए या लोगों के विरुद्ध कार्यवाहियाँ करने के लिए यह अवमानना का मामला है- जो संसद के सदस्यों तक ही सीमित नहीं है अपितु इसका विस्तार जनता के लोगों तक है जिन्होंने संसद की अवमानना की है। और एक छोटा सा पैरा पढूंगा, जो मैंने ‘मे महोदय’ से सावयव लिया है :-

‘‘सदनों की दांडिक अधिकारिता उनके अपने सदस्यों तक ही और उन अपराधों तक ही सीमित नहीं है जो उनकी आसन्न उपस्थिति में किए जाते हैं। अपितु, इसका विस्तार सदनों के सभी अवमाननाओं तक होता है भले ही वे सदस्यों द्वारा या उन