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व्यक्तियों द्वारा हों, जो सदस्य नहीं हैं। भले ही अपराध सदन के भीतर किया गया हो या उसकी चारदीवारी के बाहर।’’
अतः अवमानना से, जो विशेषाधिकार के भंग का एक पहलू है, स्वयं अपने संरक्षण के लिए संसद की अधिकारिता संसद के सदस्यों तक ही सीमित नहीं है। इसका विस्तार सभी नागरिकों तक है। कोई नागरिक कोई ऐसा कार्य नहीं करेगा जो सदन के विशेषाधिकार के अवमानना की कोटि में आए। इसलिए यदि तर्क की दृष्टि से हम यह मानते हैं कि श्री मुद्गल का त्याग-पत्र जो आपको दिया गया है अब तत्काल प्रभावी हो गया है, मेरे इस निवेदन के बावजूद कि उसके विरुद्ध इस सदन की अधिकारिता कार्यवाही को अग्रसर करने के लिए बनी रहती है। वे इससे बच नहीं सकते। दंड का क्या रूप हो यह एक भिन्न मामला है, जिस पर उस समय विचार किया जा सकता है जब हम उस पर वास्तव में आएंगे। यदि मेरे माननीय मित्र पंडित मैत्रा की दलील यह है कि अपना त्याग-पत्र देकर आप संसद की अधिकारिता से बच जाते हैं, तो मैं सोचता हूँ कि यह बिल्कुल गलत हैं।
पंडित मैत्रा : मैं इसे भिन्न तरीके से रखता हूँ।
डॉ. अम्बेडकर : मैंने उस रूप में रखा है जो अधिक बोधगम्य है।
पंडित मैत्रा : एक बार जब कार्यवाही प्रारंभ हो जाती है तो किसी का भी यह पक्षकथन नहीं हो सकता कि इसे कभी नहीं रोका जा सकता।
डॉ. अम्बेडकर : जब तक अधिकारिता विद्यमान रहती है, कार्यवाही चलती रह सकती है।
सरदार बी. एस. मान : व्यवस्था के मुद्दे पर। वह प्रस्ताव, जिस पर चर्चा हो रही है, तब अनुज्ञेय था जब इसे पुरःस्थापित किया गया था किंतु अब पश्चात्वर्ती घटनाओं से यह अननुज्ञेय हो गया है। मैं इस पर आपका विनिर्णय चाहता हूँ।
आप देखेंगे कि प्रस्ताव में विनिर्दिष्ट रूप से यह कहा गया है :-
‘‘कि यह सदन संसद-सदस्य श्री एच. जी. मुदगल के आचरण की जाँच करने के लिए 8 जून, 1951 को नियुक्त समिति की रिपोर्ट पर विचार करने के बाद.......’’
इसलिए प्रश्न संसद की अधिकारिता का नहीं है। हम ‘‘संसद-सदस्य’’ के आचरण पर चर्चा कर रहे हैं और श्री मुदगल अब ‘‘संसद-सदस्य’’ नहीं हैं। अतः मेरी दलील है कि प्रस्ताव प्रारंभ में ग्रहण करने योग्य था किंतु पश्चात्वर्ती घटनाओं के कारण यह इस दौरान अननुज्ञेय हो गया है और अब हम इस प्रस्ताव पर चर्चा करने के लिए अग्रसर नहीं हो सकते।
श्री राजगोपालाचारी : इस पर इस रीति में हम जितनी बहस करते हैं मेरे