39. संसद सदस्य का आचरण विषयक संकल्प - Page 81

64 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मस्तिष्क में यह उतनी ही स्पष्ट हो गई है कि इसका परिसीमन अनुज्ञात नहीं किया जा सकता। उन शब्दों और रीति, जिनमें प्रश्न किए जाते हैं, यह प्रकट होता है कि वह परिसीमन के अतिरिक्त कुछ और नहीं है। डॉ. अम्बेडकर ने जो कहा, उसे जारी रखते हुए यह याद रखना चाहिए कि ‘‘मे’’ में दंड अतिरिक्त है। इसमें का गया है :-

‘‘सदस्यों द्वारा हाउस आफ कॉमन्स के विरुद्ध किए गए अवमान के मामले में दो अन्य शास्तियाँ उपलब्ध हैं...........।’’ निष्कासन ही एकमात्र शास्ती नहीं है।

‘‘.............सामान्यतः सदन की सेवा से निलंबन तथा निष्कासन................।’’

निष्कासन सदस्यों के विरुद्ध किसी एक नियम की सजा के अलावा एक अतिरिक्त उपलब्ध शास्ति है जिसे सदन किसी के विरुद्ध जो, अवमान का दोषी है, पारित करने क लिए सक्षम है। अब कुछ सदस्यों की राय में निष्कासन असंभव हो सकता है, क्योंकि वह सदस्य नहीं रहा है इसलिए सदन को दूसरे किस्म के दंड पर विचार करना होगा। दोष और कार्यवाहियाँ उस व्यक्ति के कृत्य द्वारा समाप्त नहीं हो सकतीं, जिस पर आरोप लगाया गया है।

* मननीय उपाध्यक्ष : अब हम विधि मंत्री को सुन लें।

विधि मंत्री (डॉ. अम्बेडकर) : मेरे मित्र श्री नजीरुद्दीन अहमद द्वारा प्रस्तावित

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संशोधन का वास्तव में श्री मुदगल के त्याग-पत्र के साथ कुछ लेना-देना नही है। संशोधन त्याग-पत्र से बहुत पहले प्रस्तुत किया जा चुका था।

श्री नजीरुद्दीन अहमद : मुझे यह प्रस्ताव नहीं रखना था। मैंने पहले ही प्रस्ताव न लाने पर विनिश्चय कर लिया था और मैंने प्राइवेट रूप से सरकारी सचेतक को वह राय बता दी थी; किंतु मैंने उसका प्रस्ताव साधारण रूप से नहीं, अत्यावश्यकता के कारण किया था। जब मैंने संशोधन सदन के पटल पर रखा तो यह इस गलत धारणा के अधीन था कि सदन की अधिकारिता नहीं है। किंतु बाद में मैंने पाया कि सदन की पूरी अधिकारिता है और मैंने इस प्रस्ताव को न रखने का विनिश्चय किया था। बाद में त्याग-पत्र की इस अत्यावश्यकता को ध्यान में रखते हुए मैंने सोचा यह सुसंगत हो सकता है यद्यपि उस समय जब मैंने सदन के पटल पर संशोधन रखा था मेरा ऐसा प्रयोजन नहीं था।

डॉ. अम्बेडकर : मैं अपने माननीय मित्र का हेतु और प्रयोजन नहीं समझा।

श्री नजीरुद्दीन अहमद : नहीं, कभी-कभी यह कठिन होता है।

* संसदीय वाद-विवाद, खड-14, भाग- II, 25 सितंबर, 1951, पृ. 3271-75