39. संसद सदस्य का आचरण विषयक संकल्प - Page 82

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डॉ. अम्बेडकर : किंतु यह तथ्य शेष रहता है कि संशोधन श्री मुद्गल के त्याग-पत्र

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से बहुत पहले दिया गया था और संशोधन का प्रयोजन निस्संदेह उस दंड को कम करना था जो उस मूल प्रस्ताव में प्रस्तावित था, जो माननीय प्रधान मंत्री द्वारा रखा गया था, अब जो प्रश्न उत्पन्न हुआ है वह यह है- क्या श्री मुद्गल के त्याग-पत्र को ध्यान में रखते हुए माननीय प्रधानमंत्री द्वारा यथा प्रस्तावित प्रस्ताव को उसके मूल रूप में लाया जाए या क्या कोई पश्चात्वर्ती संशोधन आवश्यक है। संपूर्ण प्रश्न दूसरे मुद्दे पर लटका प्रतीत होता है अर्थात् क्या श्री मुद्गल का त्याग-पत्र ठीक है ताकि इसे त्याग-पत्र के रूप में स्वीकार किया जा सके और तत्काल प्रभावी हो सके। महोदय, आपसे मेरा यह निवेदन है कि त्याग-पत्र का कार्य या तो त्याग-पत्र के आधारों को अभिव्यक्त किए बिना या सदन पर कोई लांछन लगाए बिना कि माननीय सदस्य ने त्याग-पत्र क्यों दिया, त्याग-पत्र का साधारण कृत्य होना चाहिए। जब प्रश्न पीछे उठाया गया था तो आपने कृपापूर्वक कहा था कि त्याग-पत्र को स्वीकार करने के लिए आप स्वतंत्र हैं किंतु इस तथ्य के अधीन श्री मुद्गल द्वारा प्रयुक्त कुछ शब्दों और वाक्यों को निकाला जाए तथा इस प्रकार मिटाने के परिणामस्वरूप त्याग-पत्र को उचित बनाया जाए। महोदय, आपसे मेरा यही निवेदन है। निस्संदेह यह अध्यक्ष या उपाध्यक्ष या उस बाबत अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठा कोई व्यक्ति चर्चा के किसी भाग को जो मान हानिकारक, अशिष्ट या असंसदीय या मर्यादाहीन हो, निकालने के लिए स्वतंत्र है किंतु जो प्रश्न मैं पेश करना चाहता हूँ वह यह है कि अभिलेख के किसी भाग को निकालने के लिए अध्यक्ष का प्राधिकार केवल चर्चा के दौरान न कही गई किसी बात से संबंधित है। मैं प्रक्रिया के नियमों के नियम 176 को पढ़ना चाहता हूँ। नियम 176 कार्यवाहियों की रिपोर्ट के बारे में है। नियम 176-क विषय को निकालने के बारे में है तथा यह कहता हैः-

पूर्वाह्न 10.00 बजे

‘‘ यदि अध्यक्ष की राय है कि चर्चा में एक या दो ऐसे शब्द प्रयुक्त हुए हैं जो मानहानिकारक या अशिष्ट या असंसदीय या मर्यादाहीन है तो वह विवेक से यह आदेश कर सकेंगे कि ऐसा शब्द या ऐसे शब्द सदन की कार्यवाहियों से निकाल दिए जाएँ।’’

जैसा कि आप देखेंगे, यह नियम चर्चा के दौरान कही गई किसी भी बात तक सीमित है। मेरा ससम्मान निवेदन है कि श्री मुद्गल द्वारा दिया गया त्याग-पत्र शब्द के अर्थ को खींचकर चर्चा के दौरान की गई किसी बात के रूप में नहीं समझा जा सकता। इसलिए यह सदन की कार्यवाहियों से बिल्कुल बाहर है और इसीलिए अध्यक्ष को उन शब्दों को निकालने की कोई शक्ति नहीं है जो स्वीकृततः (मेरा विश्वास है) सदन तथा सरकार दोनों ही राय में ऐसे हैं जो नियम 176-क में उल्लिखित आधारों पर निकाले जाने योग्य नहीं हैं। अतः नियम 176 क श्री मुद्गल द्वारा दिए