39. संसद सदस्य का आचरण विषयक संकल्प - Page 86

69

इस बाबत प्रश्न उठता है कि क्या त्याग-पत्र विधिमान्य रूप में है या नहीं, तो मैं सोचता हूँ यह मामला स्वयं सदन को विनिश्चित करना है।

पंडित मैत्रा : यह संविधान में कहाँ उपबंधित है? हर बात संविधान में उपबंधित होनी चाहिए। कृपया यह मत भूलें कि इस देश के लिए आपके पास लिखित संविधान है।

डॉ. अम्बेडकर : अतः मेरा निवेदन यह है कि यदि त्याग-पत्र का कोई भाग निकाला नहीं जा सकता है और वह उस पत्र का भाग अवश्य रहेगा तथा प्रश्न यह उठाया जाता है कि क्या त्याग-पत्र इसके मूल रूप में विधिमान्य है या नहीं, तो मैं सोचता हूँ इस पर सदन ही विनिश्चय करेगा कि श्री मुद्गल का त्याग-पत्र विधिमान्य है या नहीं। ये दो निवेदन हैं जो मैं इस प्रश्न की बाबत करना चाहता हूँ कि श्री मुद्गल का त्याग-पत्र विधिमान्य है और प्रभावी हो गया है इसलिए प्रधानमंत्री द्वारा लाए गए प्रस्ताव का अंतिम भाग निष्फल हो गया है। संपूर्ण बात की यहीं सुसंगतता है। जिस बारे में हमें विचार करना है वह यही है :- क्या माननीय प्रधानमंत्री द्वारा लाए गए प्रस्ताव का अंतिम भाग श्री मुद्गल के त्याग-पत्र के कारण निष्फल हो गया है, क्योंकि सदन के लिए ऐसा कुछ करने के लिए अग्रसर होना उचित नहीं होगा, जिसको वह कोई विधिक प्रभाव नहीं दे सकता। मेरा निवेदन है कि इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि श्री मुद्गल का त्याग-पत्र एक विधिमान्य पत्र नहीं है, श्री मुद्गल फिर भी सदन के सदस्य बने रहे हैं और माननीय प्रधानमंत्री द्वारा लाए गए प्रस्ताव का अंतिम भाग, श्री मुद्गल के संबंध से प्रभावी बनाया जा सकता है।

माननीय उपाध्यक्ष : हम यह धारणा करेंगे कि एक माननीय सदस्य अपना त्याग-पत्र देता है- यह श्री मुद्गल का मामला नहीं है- और इसके कुछ क्षण बाद वह यह कहते हुए अध्यक्ष को अन्य पत्र लिखता है कि वह इसे वापिस लेना चाहता है। क्या उसे वापिस लेने के लिए उपबंध है? क्या मैं उसे सदन में बैठने और मत देने के लिए इजाजत दे सकता हूँ।

डॉ. अम्बेडकर : नहीं। जब तक पहला मामला नहीं निपटाया जाता है।

पंडित मैत्रा : इस मामले में निपटाने का साधारण अर्थ सभापति या अध्यक्ष को त्याग-पत्र प्रस्तुत करना है। संविधान में इससे भिन्न कुछ अनुध्यात नहीं है।

माननीय उपाध्यक्ष : क्या त्याग-पत्र के लिए संविधान में कोई प्ररूप विहित है?

डॉ. अम्बेडकर : मैं नहीं समझता कि है।

*****