खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 100

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अथवा सृजित, अनुरक्षित या लाइसेंसशुदा किसी धार्मिक अथवा खैराती न्यास की प्रसुविधाओं में किसी भेदभाव के बिना हिस्सेदारी के लिए उपयुक्त और समर्थ समझे जाने के लिए,

(5) व्यक्ति और संपत्ति की सुरक्षा के लिए सभी विधियों और कार्यवाहियों के पूर्ण और समान प्रसुविधा का जिसका उपयोग छूआछूत की किसी पूर्व शर्त पर ध्यान दिए बिना, अन्य लोगों द्वारा किया जाता है, और समान, दंड, कष्ट और जुर्माने के अधीन हो, दावा करने के लिए।’’

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शर्त संख्या

दलित वर्गों को उनका कल्याण सुनिश्चित करने के प्रयोजनार्थ विधायी और कार्य कार्रवाई को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त राजनीतिक शक्ति दी जानी चाहिए।

इसके दृष्टिगत, वे मांग करते हैं कि उन्हें निम्नलिखित प्रदान करने के लिए

चुनाव कानून में निम्नलिखित प्रावधान किया जाएगा -

(1) देश-प्रांत और केंद्र के विधानमंडलों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व का अधिकार।

(2) स्वयं अपने लोगों को अपने प्रतिनिधियों के रूप में चुनने का अधिकार -

(क) प्रौढ़ मताधिकार, और

(ख) प्रथम दस वर्षों के लिए पृथक मतदाताओं द्वारा और उसके बाद संयुक्त

मतदाताओं और आरक्षित सीटों द्वारा यह समझते हुए कि संयुक्त

मतदाताओं को दलित वर्गों पर उनकी इच्छा के विरुद्ध, नहीं लादा जाएगा

जब तक कि ऐसे संयुक्त मतदाताओं को प्रौढ़ मताधिकार प्राप्त न हो।

टिप्पणी - दलित वर्गों के लिए पर्याप्त प्रतिनिधित्व को मात्रात्मक रूप से तब तक परिभाषित नहीं किया जा सकता जब तक अन्य समुदायों को प्रतिनिधित्व की मात्रा ज्ञात हो। किन्तु यह समझा जाना चाहिए कि दलित वर्ग उन्हें अनुज्ञात से बेहतर शर्तों पर निर्धारित किए जा रहे किसी अन्य समुदाय के प्रतिनिधित्व की सहमति नहीं देंगे। वे इस मामले में अलाभकारी स्थिति में रखे जाने पर सहमत नहीं होंगे। किसी भी मामले में, प्रांतों में अन्य अल्पसंख्यकों को अनुज्ञात प्रतिनिधित्व की सीमा पर ध्यान दिए बिना बंबई और मद्रास के दलित वर्गों को उनकी जनसंख्या के अनुपात से अधिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।