खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 102

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प्रावधान किया जाना चाहिए, क्योंकि चाहे कितना भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व हो दलित वर्ग सभी विधानमंडलों में अल्पसंख्यक होंगे। दलित वर्ग इसे बहुत आवश्यक समझते हैं कि संविधान में उन्हें प्रतितोषण के साधन दिए जाने चाहिएं। इसलिए प्रस्ताव किया जाता है कि भारत के संविधान में निम्नलिखित प्रावधान किया जाना चाहिए :-

ब्रिटिश नार्थ अमरीका दलित वर्गों की शिक्षा, सफाई, लोक सेवाओं में भर्ती तथा

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ब्रिटिश नार्थ अमरीका

ऐक्ट, 1867, धारा 93 सामाजिक और राजनीतिक उन्नति के अन्य मामलों के लिए

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ऐक्ट, 1867, धारा 93

पर्याप्त प्रावधान करना और उन्हें प्रभाव डालने वाला कुछ भी कार्य नहीं करने की पर्याप्त व्यवस्था करना ‘‘प्रत्येक प्रांत में और भारत में और उनके लिए विधि द्वारा स्थापित विधानमंडल और कार्यपालिका अथवा अन्य किसी प्राधिकारी का कर्त्तव्य होगा और बाध्यता होगी।

(2) जहां किसी प्रांत अथवा भारत में इस धारा के प्रावधानों का उल्लंघन किया जाता है वहां किसी प्रांतीय प्राधिकारी के कृत्य या विनिश्चय के विरूद्ध अपील सपरिषद गवर्नर जनरल को और मामले को प्रभावित करने वाले किसी केंद्रीय प्राधिकारी के कृत्य या विनिश्चय के विरुद्ध विदेश मंत्री को अपील की जाएगी।

‘‘(3) ऐसे प्रत्येक मामले में, जहां सपरिषद गवर्नर जनरल अथवा विदेश मंत्री को प्रतीत होता है कि इस धारा के प्रावधानों के विधिवत निष्पादन के लिए प्रांतीय प्राधिकारी अथवा केंद्रीय प्राधिकारी समुचित उपाय नहीं करते वहां ऐसे प्रत्येक मामले में और जैसा प्रत्येक मामले की परिस्थितियों में अपेक्षित हो सपरिषद गवर्नर-जनरल अथवा विदेश मंत्री अपील प्राधिकारी के रूप में कार्य करते हुए, ऐसी अवधि, जिसे वे उचित समझे, इस धारा के प्रावधानों और इस धारा के अधीन उसके किसी निर्णय के सम्यक् निष्पादन के लिए उपचारात्मक उपाय निर्धारित कर सकता है और वह उस प्राधिकारी पर बाध्यकारी होगा जिसके विरूद्ध अपील की गई है।

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शर्त संख्या
विशेष विभागीय देखभाल

दलित वर्गों की असहाय, अभागी और दुर्बल अवस्था रूढि़वादी जनसंख्या, के जो दलित वर्गों को समानता का स्तर देने अथवा समानता का व्यवहार करने की अनुमति नहीं देगी, संपूर्ण रूप से प्रबल प्रतिरोध के कारण है। उनकी आर्थिक दशा का वर्णन करना पर्याप्त नहीं है कि वे निर्धनता से पीडि़त हैं अथवा वे भूमिहीन श्रमिक की श्रेणी के हैं यद्यपि ये दोनों बयान तथ्य परक हैं। यह उल्लेखनीय है कि दलित