खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 103

86 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

वर्गों की निर्धनता मोटे तौर पर सामाजिक पूर्वाग्रहों के कारण है, जिसके फलस्वरूप आजीविका कमाने के कई अवसर उनके लिए बंद हैं। यह एक तथ्य है, जो दलित वर्गों की स्थिति को सामान्य जाति के श्रमिकों से अलग करता है और यह प्रायः दोनों के बीच अशांति का स्रोत है। दिमाग में यह भी रखना होगा कि दलित वर्गों के विरुद्ध किए जाने वाले अत्याचार और उत्पीड़न के रूप बहुत किस्म के हैं और स्वयं का संरक्षण करने के लिए दलित वर्गों की क्षमता अत्यधिक सीमित है। इस संबंध में प्राप्त होने वाले तथ्यों का जो संपूर्ण भारत में आम तौर पर घटते हैं, विवरण दिनांक 5 नवम्बर, 1892, नं. 723 के मद्रास सरकार के राजस्व बोर्ड की कार्यवाही के सारांश में दिया गया है, जिससे लिया गया उद्धरण निम्नलिखित हैं :

‘‘134. केवल अब तक इंगित उत्पीड़न के रूप हैं जिनका उल्लेख कम से कम सरसरी तौर पर किया जाना चाहिए। परियाज की अवज्ञा का दंड देने के लिए उनके स्वामी -

(क) गांव के न्यायालय अथवा दंड न्यायालय में झूठे मुकदमे लाते हैं।

(ख) परियाओं के पशुओं को कांजी हाउस में रखने अथवा उनके मंदिर तक के मार्ग को अवरुद्ध करने के लिए पराचेरी के चारों तरफ पड़ी बंजर भूमि को आवेदन करके सरकार से प्राप्त करते हैं।

(ग) पराचेरी के विरुद्ध सरकारी खाते में धोखे से भिरासी का नाम प्रविष्ट करा लेते हैं।

(घ) झोपडि़यां गिरा देते हैं और पिछवाड़े में होने वाले विकास को नष्ट कर देते हैं।

(ड) अतिप्राचीन उप-काश्तकारी में अधिभोग का अधिकार नकारते हैं।

(च) परियाओं की फसलों को जबरदस्ती काटते हैं और प्रतिरोध करने पर उन पर चोरी और दंगा करने का आरोप लगाते हैं।

(छ) मिथ्या व्यपदेशन के अधीन उन्हें दस्तावेज निष्पादित करने के लिए कहते हैं, जिसके द्वारा वे बाद में बर्बाद हो जाते हैं।

(ज) उनके खेतों से जल प्रवाह को काट देते हैं।

(झ) कानूनी नोटिस दिए बिना ही भूस्वामियों के राजस्व बकाए के लिए उप-काश्तकारों की संपत्ति की कुर्की करवा लेते हैं।