खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 104

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‘‘135. यह कहा जाएगा कि इनमें से किसी भी क्षति के प्रतितोषण के लिए सिविल और दंड न्यायालय हैं। निस्संदेह, न्यायालय हैं; परंतु भारत में ग्राम न्याय व्यवस्था विकसित नहीं है। किसी को भी न्यायालय जाने के लिए साहस होना चाहिए, कानून के जानकार को नियोजित करने और कानूनी खर्च पूरा करने के लिए धनराशि तथा मामले और अपील के दौरान जीवित रहने के साधन होने चाहिएं। इसके अतिरिक्त, अधिकांश मामले प्रथम न्यायालय के निर्णय पर निर्भर करते हैं, और इन न्यायालयों की अध्यक्षता ऐसे अधिकारियों द्वारा की जाती है, जो कभी-कभी भ्रष्ट होते हैं और साधारणतया अन्य कारणों से उन धनी तथा भूमि के स्वामी वर्गों, जिनके वे होते हैं, के साथ सहानुभूति रखते हैं।

‘‘136. सरकारी लोगों के इन वर्गों पर पड़े प्रभाव को अतिश्योवितपूर्ण नहीं कहा जा सकता! यह निवासियों के साथ उच्चतम और यूरोपियों के साथ भी अत्यधिक है। सर्वोच्च से लेकर निम्नतम तक प्रत्येक पद पर उनके प्रतिनिधिभरे पड़े हैं और उनके हितों को प्रभावित करने वाला कोई प्रस्ताव नहीं है परंतु वे प्रारंभ से लेकर निष्पादन तक इसके क्रम में उस पर कई तरह के प्रभाव डाल सकते हैं।‘‘

इसमें कोई संदेह नहीं कि इन परिस्थितियों के दृष्टिगत, दलित वर्गों का उत्थान तब तक एक पवित्र आशा मात्र बनी रहेगी जब तक यह कार्य सभी सरकारी कार्यकलापों की पहली पंक्ति में नहीं लाया जाता और जब तक सरकार की ओर से निश्चित नीति और दृढ़ प्रयासों द्वारा व्यवहार रूप में अवसरों की समानता सुलभ नहीं कराई जाती। इसकी प्राप्ति के लिए दलित वर्गों का प्रस्ताव है कि संवैधानिक कानून को भारत सरकार पर हर समय निम्नलिखित आशय के साथ भारत शासन अधिनियम में एक धारा जोड़कर उनकी समस्याओं से निपटने के लिए एक विभाग बनाए रखने का सांविधिक दायित्व अधिरोपित करना चाहिए :

‘‘1. इस संविधान को लागू करने के साथ-साथ और उसके भाग के रूप में, भारत सरकार में दलित वर्गों के हितों पर नजर रखने और उनके कल्याण के संवर्धन के प्रयोजनार्थ एक मंत्री के प्रभार में एक विभाग सृजित किया जाएगा!’’

‘‘2. मंत्री केंद्रीय विधानमंडल का विश्वास प्राप्त रखने तक पद धारित करेगा।’’

‘‘3. कानून द्वारा उन्हें दी गई शक्तियों और उन्हें सौंपे अथवा अंतरित कर्त्तव्यों के निर्वहन में दलित वर्गों के विरुद्ध सामाजिक अन्याय, अत्याचार अथवा उत्पीड़न के कार्यों के निवारक और संपूर्ण भारत में उनके कल्याण के सहायक उपायों की तैयारी, प्रभावी रूप से लागू करने और उनके समन्वय की प्राप्ति के लिए यथा वांछनीय सभी