98 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
प्रति उग्र थे, क्योंकि उन्होंने कहा कि ‘‘मैं डोमिनियन स्तर की पहल का प्रतिरोध नहीं करता हूँ।’’ उन्होंने कहा कि वे उनके हित के प्रति उनकी उदासीनता अथवा प्रतिरोध पर भी ध्यान नहीं देते।
डॉ. अम्बेडकर के गहन अध्ययन, गहन अध्यवसाय और अकाट्य बुद्धिमत्ता ने प्रतिनिधियों और ब्रिटिश राजनेताओं पर अभूतपूर्व प्रभाव डाला। उन्होंने विभिन्न वर्गों में सम्मान के साथ-साथ घृणा प्रेरित की। ‘‘इंडियन डेली मेल’’ के रिपोर्टर ने विचार प्रकट किया : ‘‘डॉ. अम्बेडकर ने इंगित किया कि उनके पास यह देखने का अधिदेश है कि कोई उत्तरदायी सरकार तब तक स्थापित न हो जब तक उसके साथ वास्तव में प्रातिनिधिक सरकार हो। उन्होंने भय व्यक्त किया कि सरकार का प्रस्तावित रूप वर्गों द्वारा बहुसंख्यकों में से एक होगा और उनके विरोध को ग्रेट ब्रिटेन के श्रमिक तथा उदारपंथी दलों में बहुत अधिक सहानुभूति प्राप्त हुई।
विभिन्न उप-समितियों की रिपोर्टों को दर्ज करने के बाद, गोल मेज सम्मेलन दिनांक 19 जनवरी, 1931 को समाप्त हुआ। इसके बाद हाउस ऑफ कॉमन में भारत पर चर्चा हुई। चर्चा के दौरान दलित वर्गों की शिकायतों पर आवाज गूंजी। यह इजाक फुट थे, जो व्यापक सहानुभूति वाले व्यक्ति थे। अछूतों की असमर्थता का हवाला देते हुए उन्होंने कहा, ‘‘अगर हम उनके संरक्षण के लिए रक्षोपाय स्थापित नहीं करते तो उनका खून हमारे विरुद्ध खौल सकता है। अगर मुझे भावी गवर्नरों को कोई सलाह देनी है तो वह ‘‘आपकी मुख्य चिंता इन लोगों के लिए होना चाहिए। वे अभी असुरक्षित हो सकते हैं, परंतु एक दिन वे शक्तिशाली होंगे। चूंकि धरती पर न्याय है इसलिए ऐसा कोई बैंक नहीं है, जो इन लोगों के संगृहित दुख-तकलीफों को सदैव रख सकते। अबसे लेकर बीस वर्षों में भारत की प्रगति की वास्तविक परीक्षा यह होगी कि ‘‘आपने इन लोगों के लिए क्या किया है?’’ यह भाषण लंदन में डॉ. अम्बेडकर के अनवरत उद्यम को एक भावपूर्ण श्रद्धांजलि है।
लंदन छोड़ने के पूर्व डॉ. अम्बेडकर ने अपने सचिव शिवतारकर को लिखे पत्र में गोल मेज सम्मेलन के कार्य पर अपनी राय व्यक्त की कि यद्यपि सम्मेलन के परिणाम के बारे में वे उहापोह की स्थिति में हैं, फिर भी वे आश्वस्त है कि इसने भारत की स्व-शासन की आधारशिला रखी है। इस आलोक में देखे जाने पर सम्मेलन एक सफलता थी। फिर भी दूसरे दृष्टिकोण से देखे जाने पर उन्होंने अवलोकन किया कि आधारशिला गारे की बजाय रेत की अधिक थी। * परंतु जहां तक दलित वर्गों के अधिकारों का संबंध है, उन्होंने कहा कि यह एक अभूतपूर्व सफलता थी।
* डॉ. अम्बेडकर का दिनांक 21 जनवरी, 1931 का पत्र।