100 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
यद्यपि हम विफल हुए क्योंकि अन्य सभी पार्टियों ने नेहरू रिपोर्ट के हस्ताक्षरकर्ताओं के रूप में अपनी स्थिति पर गलतबयानी की। मैं इस आशा पर जिंदा रहा हूं कि जब श्री गांधी समझौते की अपनी शर्तें निर्धारित करने के लिए आएंगे तब वे यह देखेंगे कि संविधान, जिसका वे हिस्सा होंगे, पूर्ण रूप से लोकतांत्रिक होगा।
अगर श्री गांधी भारत में आम पुरुष और महिला को राजनीतिक शक्ति प्राप्त कराने के हमारे प्रयासों को विफल करते हैं तो मैं उनके इस कार्य को, विश्वास को, अत्यधिक धोखा देने और नागरिक अवज्ञा के उनके अभियान को दलित वर्गों की सेवा के लिए जनसाधारण का सबसे खराब शोषण कहने में नहीं हिचकिचाऊंगा। इस तथ्य के दृष्टिगत कि श्री गाँधी का राजनीतिक दर्शन कई लोगों को ज्ञात नहीं हैं, जनता के उन नेताओं के लिए जो स्वयं को उनका अनुयायी और शिष्य मानते है, उनसे नागरिक अवज्ञा के उनके अभियान में आगे उन्हें कोई समर्थन देने के पूर्व वयस्क मताधिकार के प्रश्न पर अपने विचार की घोषणा करने की मांग करना उचित हो सकता है।
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‘‘सर्वाधिक महत्वपूर्ण समस्या निस्संदेह अल्पसंख्यकों की समस्या है। इस समस्या के समाधान के बिना भारत के लिए कोई स्वतंत्रता नहीं हो सकती। दुर्भाग्यवश, सम्मेलन इस समस्या का समाधान करने में विफल रहा। परंतु राजनीतिक सुधार की दशा में आगे कदम बढ़ाने के पूर्व समाधान अवश्य खोजा जाना चाहिए। इसे भारत में माना गया प्रतीत नहीं होता कि सम्मेलन ने बहुसंख्यक समस्या के सहमत समाधान पर निर्भर रहते हुए राजनीतिक शक्ति प्रदान की। दलित वर्गों, जिनका श्री आर. एम. श्रीनिवासन और मैंने सम्मेलन में प्रतिनिधित्व किया, के प्रश्न के संबंध में, मैं प्रसन्न हूं कि भारत के भावी संविधान में उनका स्थान सुरक्षित है और उनकी अशक्ताएं अस्तित्व में नहीं रहेंगी।’’ ख्1,
ठीक इसी समय गोल मेज सम्मेलन के दूसरे सत्र के प्रतिनिधियों के नाम जुलाई के तीसरे सप्ताह में घोषित किये गये। डॉ. अम्बेडकर, शास्त्री, सप्रू, जयकर, सीतलवाड, मालवीय, सरोजिनी नायडू, गांधी, मिर्जा इस्माइल, जिन्ना, रामास्वामी मुदालियर और अन्य को लंदन में सम्मेलन में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया। डॉ. अम्बेडकर को जानबूझकर गोल मेज सम्मेलन के प्रथम सत्र में संघीय संरचना समिति से निकाल दिया गया। उनकी देशप्रेमपूर्ण विचारधारा और आम आदमी तथा
- द टाइम्स आफ इंडिया, दिनांक 28 फरवरी, 1931 ।