106 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
गोल मेज सम्मेलन का प्रमुख कार्य संघीय संरचनात्मक समिति और अल्पसंख्यक समिति को करना था। इस सम्मेलन को गोल मेज सम्मेलन के पहले सत्र की तत्संबंधी समितियों द्वारा तैयार की गई रिपोर्टों की पुनः जांच करनी थी तथा इनका विस्तारण करना था। महात्मा गांधी ने इस सम्मेलन में अपना पहला भाषण 15 सितम्बर, 1931 को संघीय संरचनात्मक समिति में दिया। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस सभी भारतीय हितों तथा वर्गों का प्रतिनिधित्व करती है। उन्होंने सम्मेलन को बताया कि कांग्रेस मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करती है क्योंकि मुसलमान इसके अध्यक्ष रहे हैं और मुसलमान इसकी कार्य-समिति के सदस्य भी रहे हैं। यह दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है क्योंकि अस्पृश्यता को समाप्त करना कांग्रेस के राजनीतिक घोषणा-पत्र में शामिल था। गांधी ने बताया कि कांग्रेस रियासतों के राजाओं के साथ भी खड़ी है क्योंकि ‘‘अब भी कांग्रेस ने भारत के राजाओं के घरेलू एवं आंतरिक कार्यों में हस्तक्षेप न करके उन्हें मदद पहुंचाने का प्रयास किया है’’। गाँधी ने कहा कि कांग्रेस महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी करती है क्योंकि डा. एनी बेसेंट और सरोजिनी नायडू कांग्रेस की अध्यक्ष रही हैं और चूंकि कांग्रेस के वे एकमात्र प्रतिनिधि हैं, इसका तात्पर्य यह हुआ कि वह भारत के एकमात्र प्रतिनिधि हैं।
डॉ. अम्बेडकर ने गांधी के इस भाषण से यह अन्दाजा लगा लिया था कि हवा किस ओर बह रही है। डा. अम्बेडकर ने उसी दिन संघीय संरचनात्मक समिति में अपना पहला भाषण दिया। उन्होंने रियासतों के राजप्रमुखों से कहा कि संघीय संरचनात्मक समिति, जो कुछ भी रियासतें चाहती हैं, उसे आंख बंद करके नहीं दे सकती। बीकानेर के महाराजा को यह बात अच्छी नहीं लगी और उन्होंने उत्तर दिया कि रियासतें कोरे चेक पर हस्ताक्षर भी नहीं कर सकती। डॉ. अम्बेडकर ने इस मुद्दे पर जोर देते हुए कहा कि किसी राष्ट्र को संघीय ढांचे में शामिल करने से पूर्व उसे यह सिद्ध करना चाहिए कि अपने नागरिकों को एक सभ्य जीवन उपलब्ध कराने के लिए उसके पास आवश्यक संसाधन तथा क्षमता है। डॉ. अम्बेडकर ने यह मुख्य शर्त रखी कि संघीय सभा के लिए प्रांतों के प्रतिनिधियों का चयन चुनाव द्वारा किया जाना चाहिए न कि नामांकन द्वारा। उनकी यह पुष्ट राय थी कि नामांकन कार्यपालिका को विधायिका के प्रति गैर-उत्तरदायी बनाते हैं और बाहरी दुनिया को यह भ्रम होता है कि विधायिका बहुमत के नियम के आधार पर सामान्य रूप से कार्य कर रही है। उन्होंने कहा कि नामांकन का सिद्धांत जिम्मेदार सरकार के सिद्धांत के विरुद्ध है। जहां तक भूस्वामियों की विशेष प्रतिनिधित्व संबंधी मांग का संबंध है, उन्होंने कहा कि उन्हें विशेष प्रतिनिधित्व नहीं मिलना चाहिए क्योंकि वे रूढि़वादिता के पक्ष में हैं जिससे स्वतंत्रता एवं प्रगति प्रभावित होती है। स्पष्टतः, यह रियासतों के लोगों के अधिकारों के बचाव में दिया गया प्रथम तथा सर्वोत्तम भाषण था।