खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 124

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इन मजबूत विचारों ने राजप्रमुखों भूस्वामियों और उनके संरक्षकों को चकित कर दिया जो राजाओं की इस राय के पक्षधर थे कि संघीय सभा के लिए प्रतिनिधियों का चयन नामांकन द्वारा किया जाना चाहिए। परिणाम यह हुआ कि प्रत्येक वक्ता ने अपने भाषण के कुछ हिस्से में डॉ. अम्बेडकर के भाषण का खंडन या उसका समर्थन किया क्योंकि उनमें से अधिकांश की राय थी कि डॉ. अम्बेडकर के विचार अतिवादी एवं क्रांतिकारी हैं।

अगले दिन गांधी ने गोल मेज सम्मेलन में अपने विचार व्यक्त किए। इस सम्मेलन में ब्रिटिश सरकार द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों ने भाग लिया, न कि देश द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों ने। ऐसा नहीं है कि गांधी को लंदन के लिए प्रस्थान करने से पहले इस बारे में जानकारी नहीं थी। लेकिन अब उन्होंने प्रतिनिधियों को फटकारना शुरू कर दिया। संघीय विधायिकाओं में प्रांतीय प्रतिनिधित्व के बारे में डॉ. अम्बेडकर के विचारों के संबंध में गांधी ने कहा कि जहां वे मोटे तौर पर डॉ. अम्बेडकर से सहमत हैं, वहीं उनकी दलील पूर्णरूपेण गाविन जोन्स और सर सुल्तान अहमद के पक्ष में थी जिन्होंने राजाओं के बारे में अपने विचार व्यक्त किए थे। गाँधी ने संघ शासन से जुड़े प्रस्ताव का पक्ष लिया, लेकिन रियासतों के लोगों के दृष्टिकोण की बजाए राजाओं के दृष्टिकोण का यह कहकर समर्थन किया कि : विनम्रतापूर्वक कहना चाहूंगा कि हमें यहां रियासतों से यह कहने का कोई अधिकार नहीं है कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए।

इसके बाद गाँधी ने उस महत्वपूर्ण समस्या को उठाया जो प्रतिनिधियों के मन में थी। उन्होंने अलग-अलग समुदायों द्वारा विशेष प्रतिनिधित्व के दावे से जुड़ी समस्या का जि़क्र किया और कहा कि : ‘‘कांग्रेस ने हिन्दू-मुस्लिम-सिख गुत्थी के प्रति विशेष व्यवहार से स्वयं को संतुष्ट कर लिया है। इसके ठोस ऐतिहासिक कारण हैं, लेकिन कांग्रेस किसी भी सूरत में इस सिद्धांत का विस्तार नहीं करेगी। मैंने विशेष हितों की सूची सुनी है। जहां तक छूआछूत का संबंध है, मैंने उस सब को अभी तक ठीक प्रकार से नहीं समझा है जो कुछ भी डॉ. अम्बेडकर को कहना है, लेकिन डॉ. अम्बेडकर अछूतों के हित के बारे में जो कुछ भी कहेंगे, निस्संदेह कांग्रेस उसका दायित्व अपने ऊपर लेगी। अछूतों के हित कांग्रेस को उतने ही प्रिय हैं जितने कि समूचे भारत के किसी अन्य व्यक्ति को। अतः मैं किसी और विशेष प्रतिनिधित्व का अत्यंत कड़ाई से विरोध करूंगा।’’

अम्बेडकर ने कहा कि यह अछूतों के विरुद्ध गाँधी द्वारा और कांग्रेस द्वारा और कुछ नहीं बल्कि युद्ध की घोषणा है। उन्होंने आगे यह कहा कि ‘‘मिस्टर गाँधी द्वारा यह घोषणा करने से मुझे पता चल गया कि अल्पसंख्यक समिति में जो इस प्रश्न पर चर्चा करने के लिए प्रमुख मंच हैं श्री गाँधी क्या करेंगे।’’