खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 125

108 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

18 सितम्बर को संघीय संरचनात्मक समिति की बैठक में अम्बेडकर ने खड़े होकर गाँधी से पूछा कि संघीय विधायिका तथा संघीय कार्यपालिका का गठन करने के बारे में गांधी द्वारा व्यक्त किए गए विचार उनके अपने हैं या फिर कांग्रेस के हैं। जब दीवान बहादुर, रामास्वामी मुदलियार ने यह कहा कि लोक सेवक, जो राजनीतिक विभाग का गठन करते हैं, उतने ही ईमानदार और निष्पक्ष हैं जितना कि भारत या भारत से बाहर कहीं के भी लोक सेवकों का कोई अन्य निकाय। डॉ. अम्बेडकर ने उनसे तुरंत पूछा कि यदि ऐसा है तो उन्हें एक उत्तरदायी सरकार की जरूरत क्यों है। पंडित मालवीय ने अपने भाषण में राजाओं के प्रति धैर्य और शिष्टाचार दर्शाने का निवेदन किया तथा यह कहा कि अगर सरकार ने समस्त संसाधनों का उपयोग किया होता और जनता में प्राथमिक शिक्षा का संवर्धन करने पर पर्याप्त धनराशि व्यय की होती तो उन्हें पक्का विश्वास है कि दलित वर्ग नामक शब्द अब तक इतिहास के पन्नों में कहीं लुप्त हो गया होता। डॉ. अम्बेडकर ने तुरंत अपना उदाहरण प्रस्तुत किया और कहा कि अपनी शिक्षा के बावजूद वे अभी तक अछूत हैं। डॉ. अम्बेडकर को जवाब देते हुए सर अकबर हैदरी ने अपने भाषण के दौरान कहा कि ‘‘यदि मैं कहूं तो डॉ. अम्बेडकर जैसे लोगों के भाषण स्थिति की वास्तविकता का सही-सही मूल्यांकन नहीं करते हैं।’’ इस पर डॉ. अम्बेडकर ने जवाब दिया कि ‘‘मैं वास्तविकता का मूल्यांकन न कर पाने का दोषी कभी भी नहीं रहा हूं।’’

संघीय संविधान तैयार करने के बारे में चर्चा करते समय किसी ने भी संघीय शासन प्रारंभ करने की समय-सीमा का उल्लेख नहीं किया। डा. अम्बेडकर ने इस पर से पर्दा उठाया और कहा कि ‘‘मैं नहीं समझता कि कोई भी ब्रिटिश भारतीय यह चाहेगा कि एक उत्तरदायी सरकार को तब तक के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया जाए जब तक कि सभी राजा भारत की संघ सरकार में शामिल होने के बारे में अपना मन न बना लें।’’

संघीय संरचनात्मक समिति में इन चर्चाओं के दौरान तीक्ष्ण वार हुए, विचारों का आदान-प्रदान हुआ, दुनिया के संविधान संबंधी इतिहास और स्वतंत्र भारत संबंधी विचारों की समीक्षा की गई। इन विषयों पर डॉ. अम्बेडकर के भाषण जानकारी, हितों और मूल्यवान सुझावों से भरपूर थे। राजनीतिज्ञों, बैरिस्टरों, संविधानविदों, प्रोफेसरों, लाखों दलितों के संरक्षकों और रियासतों की जनता के हितैषियों ने अपनी विद्वता के विभिन्न पहलुओं से सम्मेलन को भरपूर प्रभावित किया।

अब तक सितम्बर, 1931 का तीसरा सप्ताह समाप्त हो चुका था। अल्पसंख्यक समिति को अपना कार्य 28 सितम्बर को प्रारंभ करना था। इस सत्र के एक दिन पहले गांधी के सुपुत्र देवदास गाँधी डॉ. अम्बेडकर से उनके घर पर मिले और गाँधी तथा