खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 127

110 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

1 अक्तूबर को महात्मा गांधी ने फिर से एक सप्ताह के स्थगन के लिए अनुरोध किया। उन्होंने समिति से कहा कि वे विभिन्न समूहों के मुस्लिम नेताओं से परामर्श कर रहे हैं। इस पर डॉ. अम्बेडकर खड़े हो गए और उन्होंने कहा कि वे ऐसे किसी समझौते की राह में रोड़ा नहीं डालना चाहते, लेकिन इतना जानना चाहते हैं कि दलित वर्गों को औपचारिक समिति में प्रतिनिधित्व मिलेगा या नहीं। गांधी ने हां में उत्तर दिया। इसके लिए डॉ. अम्बेडकर ने गाँधी को धन्यवाद दिया और प्रतिनिधियों की ओर मुड़ते हुए यह स्पष्ट किया कि, ‘‘महात्मा गांधी ने हमसे पहले दिन यह कहा था कि वे संघीय संरचनात्मक समिति में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक प्रतिनिधि के रूप में बोल रहे हैं और यह कि वे मुसलमानों और सिखों को छोड़कर किसी भी समुदाय को राजनीतिक पहचान देने के लिए तैयार नहीं हैं। वे एंग्लो-इंडियन, दलित वर्गों और भारतीय ईसाईयों को मान्यता देने के लिए तैयार नहीं हैं। मैं समझता हूँ कि इस समिति के समक्ष यह कहकर शिष्टाचार का कोई उल्लंघन नहीं कर रहा हूँ कि एक सप्ताह पहले जब मुझे महात्मा गाँधी से मिलने और दलित वर्गों के प्रश्न पर उनसे चर्चा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था और जब हमें अन्य समुदायों के सदस्यों के रूप में कल उनके कार्यालय में बातचीत करने का अवसर मिला था तब उन्होंने साफ-साफ शब्दों में कहा था कि संघीय संरचनात्मक समिति में उन्होंने जो दृष्टिकोण अपनाया था वह उनका पूरी तरह सुविचारित दृष्टिकोण था।’’

इसके बाद डॉ. अम्बेडकर ने यह गर्जना की कि यदि भारत के भावी संविधान में दलित वर्गों की पहचान नहीं की जाती है, जैसा कि गोल मेज सम्मेलन के पहले सत्र के दौरान अल्पसंख्यक उप-समिति ने किया था, तो वे न तो उस समिति विषेष में शामिल होंगे और न ही स्थगन प्रस्ताव को पूरा-पूरा समर्थन देंगे। सर हरबर्ट कार, डा. दत्त और अन्य ने स्थगन का स्वागत किया।

गांधी और मुस्लिम नेताओं के बीच बातचीत एक सप्ताह तक चली। समाचार-पत्रों ने यह घोषणा कर दी कि बातचीत एक उत्साहवर्धक स्तर तक पहुंच गई है। यह समाचार दिया गया कि गाँधी ने मुसलमानों के चौदह बिन्दु स्वीकार कर लिए हैं, यह मान लिया है कि संघबद्ध होने वाले प्रांतों को शेष अधिकार दिए जाएं, पंजाब और बंगाल में मुस्लिम आधिक्य की अनुमति दे दी जाए और मुसलमानों को एक कोरे चेक की पेशकश की। लेकिन सिख-मुस्लिम मुद्दे पर वार्ता हो गई।

8 अक्तूबर को गाँधी ने अल्पसंख्यक समिति के समक्ष अत्यंत खेद व्यक्त करते हुए घोषणा की कि वे अलग-अलग समूहों के बीच और उनके साथ औपचारिक वार्तालाप के जरिए साम्प्रदायिकता के प्रश्न का सर्वसम्मत हल निकाल पाने में असफल रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह असफलता भारतीय प्रतिनिधिमंडल के गठन में ही निहित