खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 130

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को और विट्ठलभाई पटेल जैसे कांग्रेसी नेताओं को बड़ा सदमा पहुंचाया है जो वे लोग गाँधी द्वारा स्थिति को ठीक प्रकार से संभाल न पाने की गुपचुप चर्चा कर रहे हैं।

डॉ. अम्बेडकर की मांगों का गांधा द्वारा विरोध करने का समूचे भारत के अछूत तबकों में व्यापक प्रतिघात और प्रतिक्रिया देखने को मिली। राव बहादुर एम. सी. राजा की अध्यक्षता में अखिल भारतीय दलित वर्ग सम्मेलन के गुड़गांव सत्र में यह घोषणा की गई कि अछूतों के मामले को गाँधी गलत ढंग से पेश कर रहे हैं, और गाँधी के इस दावे की कड़ी निंदा की कि कांग्रेस ने प्रारंभ से ही अछूतों का ध्यान रखा है तथा अछूतों के पक्ष का समर्थन किया है। सम्मेलन के अध्यक्ष राजा ने कहा ‘‘मुझे कहना है कि ये सभी बयान असत्य हैं।’’

सम्मेलन ने डॉ. अम्बेडकर की मांगों का समर्थन किया और यह घोषणा की कि दलित वर्ग को ऐसा कोई संविधान स्वीकार्य नहीं होगा जिसमें दलित वर्गों के लिए अलग निर्वाचक-गण की प्रणाली शामिल नहीं होगी। भारत के सभी भागों से दलित नेताओं तथा संघों द्वारा डॉ. अम्बेडकर को भेजे गए सैंकड़ों संदेशों के माध्यम से और तिन्नेवेल्ली, सनर्टसन (मद्रास), लायलपुर, करनाल, चिदम्बरम, कालीकट, बनारस, कोल्हापुर यवतमाल, नागपुर, चन्दा, कानपुर, कम्पटी, बेलगाम, धारवाड़, नासिक, हुबली, अहमदाबाद तूतिकोरिन, कोलम्बो और अनेक अन्य स्थानों पर आयोजित बैठकों एवं सम्मेलनों के द्वारा डॉ. अम्बेडकर से यह अनुरोध किया गया कि गाँधी तथा कांग्रेस पर विश्वास न करें।

ये केबलग्राम चिल्ला-चिल्ला कर बता रहे थे दलित वर्गों का वास्तविक प्रतिनिधि कौन है। निस्संदेह गाँधी को भी कुछ केबल मिले थे जो उन से लंदन के अलग-अलग स्थानों पर आयोजित वार्ताओं और भाषणों के दौरान परेशान करने वाली पूछताछ का जवाब देने के लिए काफी नहीं थे। डॉ. अम्बेडकर का संघर्श प्रचार इतना प्रभावशाली था कि गांधी को वास्तव में उलझन में डाल दिया था, और अछूतों के उनके धारित संरक्षकत्व का पर्दाफाश हो गया था।

यह पर्दाफाश भारत में नासिक में और गुरूवयूर में दलित वर्गों द्वारा मंदिर में प्रवेश के आंदोलन के दौरान और स्पष्ट हो गया था। नासिक में जो सत्याग्रह फिर से प्रारंभ किया गया था उसने बहुत अधिक जोर पकड़ा। पांच हजार स्वयंसेवक नासिक पहुंचे। डॉ. अम्बेडकर के समर्पित लेफ्टिनेंट, भावराव गायकवाड, रणखम्बे, पतितपावनदास जैसे दलित वर्गों के नेताओं और विश्वासपात्र लेफ्टिनेंट देवराव नायक ने संघर्ष को आगे बढ़ाया, रूढि़वादी हिन्दुओं का भंडा फोड़ कर दिया। यह लज्जा इतनी तीक्ष्ण थी कि डॉ. मंजु ने लंदन से हिन्दुओं से अनुरोध किया कि वे अपने