खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 132

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अक्तूबर, 1931 के अंत में ब्रिटेन में चुनाव हुए और टोरी सत्ता में आ गए। श्रमिक सरकार की हार पर डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि उनका कार्यक्रम इतना वैज्ञानिक था कि श्रमिक तथा औसत ब्रिटिश नागरिक उसे समझ नहीं सका। डॉ. अम्बेडकर ने अपने एक पत्र में लिखा कि गाँधी का समर्थन करने वाले दलित वर्ग के नेता यह नहीं समझ सके कि गाँधी न केवल विशेष निर्वाचकगण के बल्कि दलित वर्गों के विशेष प्रतिनिधित्व के भी विरोधी है : अन्यथा समस्या बहुत पहले हल हो गई होती।’’ *

सम्मेलन के पहले सत्र के दौरान अल्संख्यक उप-समिति के समक्ष प्रस्तुत किए गए पहले ज्ञापन के अलावा, दिनांक 4 नवम्बर, 1931 का एक पूरक ज्ञापन डॉ. बी. आर. अम्बेडकर और राव बहादुर आर. श्रीनिवासन द्वारा संयुक्त रूप से प्रस्तुत किया गया था। अनुपूरक ज्ञापन इस प्रकार है :- सम्पादक डा. भीमराव आर. अम्बेडकर और राव बहादुर आर. श्रीनिवासन द्वारा

स्वाधीन भारत के संविधान में दलित वर्गों का बचाव करने के लिए राजनीतिक उपायों के प्रश्न के बारे में हमने गत वर्ष एक ज्ञापन प्रस्तुत किया थ, जो अल्संख्यक उप-समिति की कार्यवाही के मुद्रित खंड का परिशिष्ट- III था, उसमें यह मांग की गई थी कि दलित वर्गों का विशेष प्रतिनिधित्व इन उपायों में से एक होना चाहिए। तब हमने उस विशेष प्रतिनिधित्व के ब्यौरों को परिभाषित नहीं किया था जिसे हम उनके लिए आवश्यक होने का दावा करते हैं। इसका कारण यह था कि इस प्रश्न पर चर्चा प्रारंभ होने से पहले ही अल्पसंख्यक उप-समिति की कार्यवाही समाप्त हो गई थी। हम इस अनुपूरक ज्ञापन के माध्यम से उस चूक की भरपाई करना चाहते हैं ताकि यदि अल्संख्यक उप-समिति इस वर्ष इस प्रश्न पर विचार करे तो उसके पास अपेक्षित जानकारी हो।

विशेष प्रतिनिधित्व की सीमा

क. प्रांतीय विधायिका में विशेष प्रतिनिधित्व -

(i) बंगाल केंद्रीय प्रांत, असम, बिहार और उड़ीसा, पंजाब और संयुक्त प्रांत में, दलित वर्गों का प्रतिनिधित्व साइमन कमीशन तथा इंडियन सेंट्रल कमेटी द्वारा यथा

* कीर, 169-181, पृष्ठ ।