116 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अनुमानित उनकी जनंसख्या के अनुपात में होगा।
(ii) मद्रास में, दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व बाइस प्रतिशत होगा।
(iii) बम्बई में -
(क) यदि सिंध बंबई प्रेजिडेन्सी का भाग बना रहता है तो दलित वर्गों
का प्रतिनिधित्व सोलह प्रतिशत होगा।
(ख) यदि सिंध को बंबई प्रेजिडेन्सी से अलग कर दिया जाता है तो
दलित वर्गों का उतना ही प्रतिनिधित्व होगा जितना कि प्रेजिडेन्सी
मुसलमानों का, दोनों की जनसंख्या बराबर है।
ख. संघीय विधायिका में विशेष प्रतिनिधित्व -
संघीय विधायिका के दोनों सदनों में दलित वर्गों का प्रतिनिधित्व भारत में उनकी आबादी के अनुपात में होगा।
हमने विधायिका में इस अनुपात का निर्धारण निम्नलिखित धारणाओं के आधार पर किया है :-
(1) हमने माना है कि साइमन कमीशन (खंड 1, पृष्ठ 40) और इंडियन सेंट्रल कमेटी (रिपोर्ट, पृष्ठ 44) ने दलित वर्गों की जनंसख्या के जो आंकड़े दिए हैं वे सीटों का बंटवारा करने के आधार के रूप में पर्याप्त रूप से सही स्वीकार्य होंगे।
(2) हमने माना है कि संघीय विधायिका में समूचा भारत शामिल होगा। इस स्थिति में, गवर्नर के प्रांतों में दलित वर्गों की जनसंख्या के अलावा, भारतीय रियासतों में केंद्र प्रशासित क्षेत्रों में, और बहिष्कृत क्षेत्रों में उनकी जनसंख्या संघीय विधायिका में दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व की सीमा की गणना करते बहुत उचित रूप से एक अतिरिक्त मद होगी।
(3) हमने माना है कि ब्रिटिश इंडिया के प्रांतों का प्रशासनिक क्षेत्र वही रहेगा जो इस समय है।
लेकिन अगर जनसंख्या के आंकड़ों से जुड़ी इन धारणाओं को चुनौती दी जाती है जैसा कि कुछ हितबद्ध पक्षकारों ने चुनौती देने की धमकी दी है, और यदि एक नई जनगणना, जिस पर दलित वर्गों का कोई नियंत्रण नहीं हो सकता दलित वर्गों की जनसंख्या निम्नतर अनुपात दर्शाती है, अथवा यदि प्रांतों के प्रशासनिक क्षेत्रों में परिवर्तन किया जाता है जिससे जनसंख्या का मौजूदा संतुलन गड़बड़ा जाता है तो दलित वर्गों का यह अधिकार सुरक्षित रहेगा कि वे प्रतिनिधित्व के अपने अनुपात