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को पुनरीक्षित करें और यहां तक कि अपने बेटेज का दावा करें। इस प्रकार अगर अखिल भारतीय परिसंघ अस्तित्व में नहीं आता है तो वे संघीय विधायिका में उस आधार पर अनुमानित उनके प्रतिनिधित्व अनुपात को फिर से ठीक करने के लिए निवेदन करने के इच्छुक होंगे।
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प्रतिनिधित्व की पद्धति
- दलित वर्गों को यह अधिकार होगा कि वे अपने मतदाताओं के पृथक निर्वाचकगण के माध्यम से प्रांतीय तथा केंद्रीय विधायिकाओं के लिए अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करें।
संघीय या केंद्रीय विधायिकाओं के ऊपरी सदन में उनके प्रतिनिधित्व हेतु, यदि प्रांतीय विधायिकाओं के सदस्यों द्वारा परोक्ष चुनाव का निर्णय लिया जाता है तो दलित वर्ग जहां तक ऊपरी सदन में उनके प्रतिनिधित्व का संबंध है, अलग निर्वाचकगण के अपने अधिकार का त्याग करने के इच्छुक होंगे, लेकिन शर्त यह होगी कि समानुपाती प्रतिनिधित्व की किसी भी प्रणाली में उन्हें सीटों के उनके कोटे की गारंटी की व्यवस्था की जाएगी।
- दलित वर्गों के पृथक निर्वाचक-गण को संयुक्त निर्वाचकगण की प्रणाली से और आरक्षित सीटों से बदला नहीं जा सकता सिवाए तब जब निम्नलिखित शर्तें पूरी होती हों :-
(क) संबंधित विधायिकाओं में उनके बहुसंख्यक प्रतिनिधियों की मांग पर
मतदाताओं का जनमत संग्रह किया जाता है जिसके परिणामस्वरूप दलित
वर्गों के मताधिकार रखने वाले सदस्यों का स्पष्ट बहुमत हो जाता है।
(ख) बीस वर्ष पश्चात् और सार्वभौमिक प्रौढ़ मताधिकार सिद्ध होने पर ही
जनमत-संग्रह किया जाएगा।
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दलित वर्गों को परिभाषित करने की आवश्यकता
विगत समय में दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व का बहुत दुरुपयोग हुआ है क्योंकि दलित वर्गों से इतर व्यक्ति का नामांकन उन्हें प्रांतीय विधायिकाओं में प्रतिनिधित्व देने के लिए किया गया है और ऐसे मामलों का भी अभाव नहीं है जहां दलित वर्गों से इतर व्यक्तियों ने स्वयं को दलित वर्गों के प्रतिनिधि के रूप में नामांकित करा लिया। इस दुरूपयोग का कारण यह था कि गवर्नर को दलित वर्गों का प्रतिनिधित्व करने