खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 135

118 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

वाले व्यक्तियों को नामित करने का अधिकार तो दे दिया गया था लेकिन उनसे यह अपेक्षा नहीं की गई थी कि वे दलित वर्गों के व्यक्तियों को ही नामांकित करें। चूंकि नए संविधान के अंतर्गत चुनाव नामांकन की जगह ले लेगा, इसलिए इस दुरुपयोग की कोई गुंजाइश ही नहीं रहेगी। लेकिन विशेष प्रतिनिधित्व के उनके प्रयोजन को मात देने के लिए बचाव का कोई रास्ता न छोड़ने की दृष्टि से, हम दावा करते हैं -

(i) कि दलित वर्गों को अपने स्वयं के अलग निर्वाचकगण रखने का ही

अधिकार नहीं होगा बल्कि अपने स्वयं के लोगों द्वारा प्रतिनिधित्व कराने

का भी अधिकार होगा।

(ii) कि प्रत्येक प्रांत में दलित वर्गों को कड़ाई से ऐसे व्यक्तियों के रूप में

परिभाषित किया जाएगा जो उन समुदायों से संबंध रखते हैं जिन्हें वहां

विद्यमान छूआछूत की प्रथा से गुजरना पड़ा हो और जिनकी चुनाव के

प्रयोजनार्थ अनुसूची में नाम से गणना की गई हो।

Col1 Col2 Col3 Col4
k )

प्रश्न के इस भाग पर विचार करते समय हम यह बताना चाहेंगे कि दलित वर्गों की मौजूदा नामपद्धति पर दलित वर्गों के सदस्यों द्वारा जिन्होंने इस पर विचार किया है आपत्ति उठाई गई है। इसके अलावा, दलित वर्गों में रुचि रखने वाले बाहरी व्यक्तियों ने भी इस पर एतराज किया है। यह अपमानजनक तथा तिरस्कारपूर्ण है, और इस अवसर का लाभ मौजूदा नामावली में आधिकारिक प्रयोजनार्थ परिवर्तन करने के लिए नए संविधान का प्रारूप तैयार करने के लिए किया जाए। हम समझते हैं कि इन्हें ‘‘दलित वर्गों’’ के बजाए ‘‘गैर-सवर्ण हिन्दू’’, ‘‘प्रोटेस्टैन्ट हिन्दू’, या ‘‘गैर-अनुसारक हिन्दू’’ या ऐसे ही किसी नाम से पुकारना चाहिए। हमें कोई प्राधिकार नहीं है कि हम किसी नामपद्धति विशेष के लिए जोर डालें। हम उन्हें केवल सुझाव दे सकते हैं, और हमें विश्वास है कि यदि दलित वर्गों को ठीक प्रकार से समझाया जाए तो वे इनमें से सबसे उचित नाम को स्वीकार करने में हिचकिचाएंगे नहीं।

हमें समूचे भारत के दलित वर्गों से बड़ी संख्या में तार मिले हैं जिनमें इस ज्ञापन में की गई मांगों का समर्थन किया गया है’’ * जब सम्मेलन चल रहा था तब महामहिम

* गत ज्ञापन के लिए सम्मेलन के पहले सत्र की अल्संख्यक उप-समिति की कार्यवाही का परिशिष्ट

देखिये। दिनांक 4 नवम्बर, 1931 का यह अनुपूरक ज्ञापन मूल कार्यवाही में परिशिष्ट के रूप में

प्रकाशित किया गया है, पृष्ठ 1409-11 ।