खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 136

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सम्राट ने 5 नवम्बर को माननीय प्रतिनिधिमंडल के लिए एक स्वागत समारोह का आयोजन किया था। यह व्यवस्था की गई थी कि कुछ सदस्य पार्टी के दौरान लोगों को संबोधित करेंगे। गांधी नंगे सिर उपस्थित थे। गाँधी अपनी परम्परागत धोती और सैंडल पहने हुए थे। महामहिम सम्राट ने डॉ. अम्बेडकर से भारत में अछूतों की हालत के बारे में पूछा। डॉ. अम्बेडकर ने अपने खुले मन, भावपूर्ण नेत्रों और चमकदार चेहरे से उनकी भयावह स्थिति का वर्णन किया तो सम्राट के रोंगटे खड़े हो गए। इसके बाद महामहिम सम्राट ने डॉ. अम्बेडकर से मित्रभाव से उनके पिता और उनकी शिक्षा के बारे में पूछा और यह पूछा कि उन्होंने शैक्षिक उत्कृष्टता किस प्रकार से हासिल की।’’ ख्1,

‘‘जब ब्रिटिश प्रधान मंत्री ने देखा कि अल्पसंख्यकों की समस्या का कोई सर्वमान्य हल नहीं है तो उन्होंने अल्पसंख्यक समिति के सभी सदस्यों से कहा कि वे एक मांग पत्र पर हस्ताक्षर करके उन्हें सामुदायिक समस्या को हल करने के लिए प्राधिकृत करें और यह वचन दें कि वे उनके निर्णय को स्वीकार करेंगे। अन्य सदस्यों के साथ-साथ, गांधी ने भी इस वचन पर हस्ताक्षर किए। डा. अम्बेडकर ने इस मांग पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए क्योंकि वे अपनी मांगों के प्रति न्याय में विश्वास रखते थे। इसके बाद प्रधान मंत्री ने सम्मेलन को 1 दिसम्बर के लिए स्थगित कर दिया। इस मांग पत्र से पहले डा. अम्बेडकर ने गांधी से सर मिर्जा इस्माइल के घर पर बातचीत की थी। डॉ. अम्बेडकर का समर्थन हासिल करने के लिए, एक नई प्रक्रिया का सुझाव दिया गया। उन्होंने कहा कि अगर अछूत उम्मीदवार सीटों के आरक्षण के बिना संयुक्त निर्वाचकमंडल की प्रणाली के आधार पर आयोजित आम चुनाव में असफल रहते हैं तो दलित वर्गों को अपना सदाशय न्यायालय में सिद्ध करना होगा।’’ ख्2,

दूसरे गोल मेज सम्मेलन के स्थगन के बाद, विभिन्न व्यक्तियों और प्रेस द्वारा विभिन्न टिप्पणियाँ की गईं। ये टिप्पणियाँ इस प्रकार हैं :

‘‘भारत के एक जाने माने पत्रकार श्री टी. ए. रमण भारत लौट रहे थे। एक सहयात्री ने श्री टी. ए. रमण से कहा कि अगर उसने किसी की हत्या की होती तो वह व्यक्ति डॉ. अम्बेडकर होता। साप्ताहिक सुबोध पत्रिका में 15 नवम्बर, 1931 के अंक में कहा गया :

‘‘दलित वर्गों के बारे में हम महात्मा गाँधी के रुख को समझ पाने में असफल रहे हैं। यह तो कहना ही पड़ेगा कि यह अनुचित है और बहुत गुस्सा दिलाने वाला है। यदि कोई ऐसा समुदाय है जिसका पूरा-पूरा बचाव करने की आवश्यकता है तो वह

1.2. कीर, पृष्ठ 181 ।कीर, पृष्ठ 190-191 ।