खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 137

120 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अछूत वर्ग है। मुसलमान और सिख भलीभांति संरक्षित हैं तथा जैसाकि एक सहयोगी ने कहा है कि उनका दृष्टिगोचर भय मात्र दिखावा है ताकि राष्ट्रमंडल में उन्हें एक विशेष स्थान मिल सके। अब हम महात्मा जी से पूछते हैं कि सक्षम समुदायों को झूठे दावों के समक्ष घुटने टेकना और अछूतों की बातों को ठुकरा देना क्या ठीक है? बातचीत के जरिए छलने का कोई लाभ नहीं, यदि साम्प्रदायिक समस्या को हल करने के लिए महात्मा गाँधी द्वारा किए गए प्रयास व्यर्थ हो रहे हैं तो इसके लिए भी वही दोषी हैं। डॉ. अम्बेडकर के उद्गार भले ही अरूचिकर रहे हैं लेकिन निराधार होने के बाद भी समझे जा सकते हैं। तथाकथित कांग्रेस जनादेश की आड़ लेने का कोई लाभ नहीं है क्योंकि इसे सभी व्यावहारिक प्रयोजनों के लिए उतना लचीला बनाया जा सकता है जितना गाँधी जी चाहें। हमें लगता है कि कांग्रेस छुआछूत को समाप्त करने की दिशा में अच्छा काम कर रही है। अन्यथा हम यह क्यों पूछते कि नेहरू समिति का गठन दलित वर्गों के एक प्रतिनिधि को शामिल करने के लिए नहीं किया गया था?’’

‘‘यदि अल्संख्यकों की समस्या के बारे में कोई ठोस निर्णय लेने में समय लगेगा, जिसकी वजह से स्वतंत्रता मिलने में भी विलंब होगा तो प्रारंभ में प्रांतीय स्वायत्तता भी स्वीकार्य है। गांधी जी ने भी अपने मित्रों से परामर्श लिए बगैर ही अपनी स्वीकृति ब्रिटिश प्रधान मंत्री को सम्प्रेषित कर दी थी। इस निजी वार्तालाप के उद्घाटित होने से भारतीय प्रतिनिधिमंडल में हड़कंप मच गया था। प्रगतिशील हिन्दुओं का प्रतिनिधित्व करने वाले डॉ. सप्रू, जयकर और हिन्दू महासभा का प्रतिनिधित्व करने वाले डॉ. मुंजे, मालवीय, आदि भी सकते में आ गए थे। उन्होंने गांधी जी के बयानों को सत्यापित करने की कोशिश की। इन्दूलाल यागनिक जो ब्राह्मण थे और लंबे अरसे से गाँधी जी से जुड़े हुए थे, ‘‘संडे एडवोकेट’’ के एक विशेष संवाददाता के रूप में लंदन गए थे। इन्होंने दिनांक 6 दिसम्बर, 1931 के ‘संडे एडवोकेट’ में लिखा था कि :

‘‘गांधी प्रांतीय स्वायत्तता को स्वीकार करते हैं। लेकिन मैं यह कहने का साहस करता हूं कि गांधी ने अपने हाथ और पैर बांध कर स्वयं को ब्रिटिश शासकों के कृपालु हाथों में सौंप दिया है। पिछले सप्ताह मैंने कुछ यूं ही गाँधी के लार्ड लोथियान के साथ हुए गुप्त समझौते का हवाला दिया था जिसमें उन्होंने भारत के लिए स्वराज्य की नई स्कीम की पहली किस्त के रूप में प्रांतीय स्वायत्तता के लिए सहमति दे दी थी। निस्संदेह, गांधी ने इस समझौते का चतुराई से इस शर्त के साथ बचाव किया था कि स्वाधीन प्रांतों तथा राज्यों के प्रतिनिधियों को बाद में उस संविधान सभा का गठन करने के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए जो भारत के संघीय संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए प्राधिकृत होगी। मैं समझता हूं कि सरकार निश्चय ही इस शर्त के लिए सहमत नहीं होगी। लेकिन उन्होंने गाँधी के इस समझौते को चतुराई से