खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 140

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श्री गवई को भेजा गया पत्र

इस बीच, इस बारे में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने एक पत्र श्री जी.ए. गवई, एम.एल.सी., महासचिव, अखिल भारतीय दलित वर्ग संघ को लिखा। वह पत्र इस प्रकार है -

पटना, 13 फरवरी

मैं लखनऊ में तथा पटना में भी आपसे मिलने के लिए आपकी प्रतीक्षा कर रहा था। मुझे हैरानी थी मुझे आपका पत्र मिलने तक आप इनमें से कहीं पर आए क्यों नहीं। मुझे आपकी बीमारी के बारे में जानकर दुख है जिस वजह से आप आ नहीं सके।

मैं आपको ज्ञापन की एक प्रति सूचनार्थ भेज रहा हूं जिसमें मेरे विचार दिए गए हैं। ज्ञापन के अंतिम पैराग्राफ में आप देखेंगे कि हमारी समिति ‘‘नहीं कर सकती’’ और इसीलिए आपकी समिति साम्प्रदायिक प्रश्न पर ‘‘चर्चा नहीं कर सकती’’। प्रधान मंत्री का पत्र और समिति द्वारा जारी प्रश्नावली इसे स्पष्ट कर देते हैं। हमारी समिति के अध्यक्ष ने इस प्रश्न पर दिल्ली और लखनऊ में एक व्यवस्था दी है जो इस राय से मेल खाती है, अतः आपको अपनी ‘‘समिति’’ को बता देना चाहिए कि वह इस प्रश्न पर चर्चा नहीं कर सकती और अगर वह दबाव डालें तो आपको इस पर चर्चा करने से इंकार कर देना चाहिए।’’

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‘‘विचारों में परिवर्तन

आपके पृथक कार्यवृत्त में पृथक बनाम संयुक्त निर्वाचकमंडल पर चर्चा करने की बजाए सिर्फ इतना कहना चाहिए कि आपने इस पर चर्चा करने से इंकार कर दिया है, क्योंकि यह समिति के दायरे से बाहर है। मुझे मालूम है कि आपके संघ के पास एक प्रश्नावली है। मैं बस एक बात का उल्लेख करना चाहूंगा। मुझे जब यह पता चला कि श्री राजा ने अपनी राय बदल ली है और अब वे संयुक्त निर्वाचकमंडल प्रणाली का समर्थन कर रहे हैं तब मुझे सदमा पहुंचा। मैं आशा करता हूं कि आपका संघ इस नीति में उनका अनुसरण नहीं करेगा जो हर स्थिति में आत्मघाती है। लेकिन अगर यह ऐसा करता है तो आपको हमारे बीच स्थायी संबंध-विच्छेद के परिणामों का और ‘‘हमारे बीच’’ युद्ध का सामना करना पड़ेगा, जिसे मैं हर हालत में टालने का प्रयास कर रहा हूँ। अतः इसके लिए अडं़े नहीं। मुझे यह आश्वासन पाकर प्रसन्नता हुई है कि आप मेरी जानकारी और सहमति के बिना कुछ नहीं