खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 143

126 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

नहीं करते थे। इतने तनावपूर्ण वातावरण में डॉ. अम्बेडकर ने अपने सचिव को सूचित किया कि एक ही समय में दो परिस्थिति से निपट न पाने का उन्हें दुख है। उनकी राय थी कि राजनीतिक अधिकारों की समस्या मंदिर में प्रवेश करने की समस्या से अधिक महत्वपूर्ण है; और इसीलिए यह मूर्खतापूर्ण और हानिकारक होती अगर जिस काम को उन्होंने अपने दिल तथा आत्मा तक को समर्पित कर दिया, उससे हट गए।

शिमला से लिखे एक पत्र में डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि यह बहुत आवश्यक है कि ब्रिटिश प्रधान मंत्री का साम्प्रदायिक मुद्दे पर निर्णय आने से पहले उनसे मिल लिया जाए। अतः उन्होंने अपने विश्वासपात्र लेफ्टिनेंटों से कहा कि यह देखें कि क्या प्रस्तावित यात्रा के लिए धन एकत्र कर पाना संभव होगा, लेकिन इसके कारण किसी को पता न चले। उन्होंने आगा खान को भी पत्र लिखा था जो उस समय लंदन में थे जिसमें उनसे इस मामले में उनकी राय मांगी गई थी और उनसे साम्प्रदायिक मुद्दे पर प्रधान मंत्री के निर्णय की संभावना तथा संभावित तारीख के बारे में पूछा गया था। उसी हफ्ते लिखे गए एक अन्य पत्र में डॉ. अम्बेडकर ने मताधिकार समिति के हिन्दू सदस्यों पर अपनी सारी घृणा उड़ेल दी और कहा कि वे उनके दिमागी ढांचे से घृणा करते हैं जो उन्हें अपने कैम्प में स्वःकेंद्रित तथा उग्र बना देता है और बाहर डरपोक तथा दबैल। उन्होंने लिखा कि वे उनके स्वार्थी तथा विचारहीन दृष्टिकोण से बहुत घृणा करते हैं और यह कि वे स्वयं को हिन्दू समाज से दूर रखने का प्रयास करेंगे। वे मानसिक और शारीरिक तनाव में काम कर रहे हैं। इसके अलावा, वे अतिसार से पीडि़त हैं।

अप्रैल में, बंगाल नमशूद्र एसोसिएशन ने डॉ. कालीचरण मंडल की अध्यक्षता में एलबर्ट इंस्टिट्यूट हॉल में अपने 14वें वार्षिक अधिवेशन का आयोजन किया। इस अधिवेशन में डॉ. अम्बेडकर की मांगों को सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया। डॉ. अम्बेडकर के रुख की अनुचित रूप से आलोचना करने वाले समाचार-पत्रों की निंदा की गई और यह घोषणा की गई कि उनकी समस्याओं के प्रति कांग्रेस का रूख गैर-सहानुभूतिपूर्ण और अव्यावहारिक है।

मताधिकार समिति ने अपना कामकाज 1 मई, 1932 को पूरा कर लिया, लेकिन लार्ड लोथियान कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर डॉ. अम्बेडकर से कुछ चर्चा करने के इच्छुक थे, इसलिए वे एक या दो दिन के लिए और रुक गए। मताधिकार समिति ने अपनी रिपोर्ट का मसौदा तैयार किया जिसमें मताधिकार के संशोधन और केंद्रीय तथा प्रांतीय विधायिकाओं के लिए निर्वाचन-क्षेत्रों के वितरण एवं सीमांकन के ब्यौरे दिए गए थे। चूंकि डॉ. अम्बेडकर की राय हिन्दू सदस्यों से मेल नहीं खाती थी, इसलिए उन्होंने समिति को अलग से एक नोट प्रस्तुत किया। समिति के सर्वाधिक