खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 144

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महत्वपूर्ण निर्णयों में से एक दलित वर्ग शब्द की सटीक परिभाषा करने के बारे में था। भारतीय विधायिका समिति ने 1916 में लिए गए अपने निर्णय में, सर हेनरी शर्थ, भारत सरकार के अधीन शिक्षा आयुक्त; और साउथब्राह मताधिकार समिति ने दलित वर्गों को आदिम या पहाड़ी जनजातियों, अपराधियों या अन्यों के साथ समूहबद्ध कर दिया था, लेकिन अब लोथियान मताधिकार समिति ने कहा कि ये शब्द केवल उन पर लागू किए जाएं जो अछूत हैं। स्पष्ट रूप से यह डॉ. अम्बेडकर की विजय थी, क्योंकि समिति को भेजे गए अपने नोट में उन्होंने इस बात पर बल दिया था कि छूआछूत का ‘‘कल्पित दृष्टि से लागू की जानी चाहिए, क्योंकि अपने शाब्दिक रूप में अस्पृश्यता अब प्रचलन में नहीं हैं।’’ ख्1,

26 मई को डॉ. अम्बेडकर ने इंग्लैंड के लिए प्रस्थान किये ताकि साम्प्रदायिक मुद्दे पर निर्णय की घोषणा होने से पहले ब्रिटिश प्रधान मंत्री और अन्य मंत्रिमंडलीय मंत्रियों से भेंट कर सकें। वे इतालवी स्टीमर एस. एस. कोंटे रेसो से रवाना हुए। उनकी इस यात्रा को बिल्कुल गुप्त रखा गया था क्योंकि उन्होंने अपने लोगों को यह आदेश दिया था कि इस बारे में किसी को कुछ न बताएं। फिर भी बंबई क्रानिकल के एक प्रतिनिधि ने किसी स्रोत से इस बारे में जानकारी हासिल कर ली और डा. अम्बेडकर की नई युक्ति पर उद्घाटनकारी रोशनी डाल दी। डॉ. अम्बेडकर ने प्रथम श्रेणी से यात्रा की, बहुत कम सामान ले गए थे तथा अगस्त, 1932 के अंत तक उनके लौट आने की संभावना थी।

यह सच है कि राजा द्वारा अपने दृष्टिकोण में अचानक परिवर्तन लाने से डॉ. अम्बेडकर काफी परेशान थे और लोथियान समिति के निष्कर्ष भी उनके पक्ष में कुछ अधिक नहीं थे। उन्होंने सोचा कि यह वह अवसर है जो बिरले ही मिलता है। इसलिए उन्होंने संकल्प लिया कि वे पूरा जोर लगा देंगे और अपना सब-कुछ दाव पर लगा देंगे। उन्हें विश्वास था कि लंदन में उनकी मौजूदगी से उनकी मांगों को और बल मिलेगा। लंदन जाते हुए अपने घर भेजे गए पत्रों में उन्होंने अपने मुद्रणालय की सुरक्षा के लिए मार्मिक चिंता व्यक्त की थी क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं कांग्रेस के बुद्धि हीन सवर्ण हिन्दू इसे जला न दें। उन्होंने शिवतारकर को हिदायत दी थी कि एक नए कमरे की व्यवस्था करें और नई पुस्तकों के वक्सों को हटा दें या किसी अन्य स्थान पर सुरक्षित रख दें। अपनी पुस्तकों की चिंता हमेशा उनके दिमाग में रहती थी। डॉ. अम्बेडकर 7 जून, 1932 को लंदन पहुंचे। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए वे एक हफ्ते में ही ब्रिटेन के सभी बड़े अधिकारियों और सभी मंत्रिमंडलीय मंत्रियों से मिले और पूरे मनोयोग से अपना पक्षकथन उनके समक्ष रखा। उन्होंने बाइस टंकित

  1. कीर, पृष्ठ 196-198 ।