खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 145

128 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

पृष्ठों का एक अभ्यावेदन ब्रिटिश मंत्रिमंडल को प्रस्तुत किया। लेकिन तब वे अपने प्रयासों के परिणाम के बारे में कुछ नहीं कह सके। उन्होंने कहा कि विचार-विमर्श होगा और बहुत ऊपरी स्तर पर निर्णय लिए जाएंगे, ऐसी चर्चा थी कि बंबई, मद्रास एवं सी.पी. प्रांतों के दलित वर्गों को अलग निर्वाचकमंडल का दर्जा मिल जाएगा। अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए, उन्होंने 14 जून तक सभी प्रयास कर लिए थे और वे वापिस लौटना चाहते थे। लेकिन उनके कुछ समर्थक चाहते थे कि वे कुछ दिन और रूक जाएं, उन्होंने एक महीने और रुकने का निर्णय लिया ताकि वे ड्रेस्डेन स्थित जर्मन सैनेटोरियम में, जिसे डॉ. मोलेर चलाते थे, स्वास्थ्य लाभ कर सकें और आवश्यकता पड़ने पर लंदन जा सकें। डॉ. अम्बेडकर को धन की आवश्यकता थी। अनिश्चित प्रवास के कारण स्वास्थ्य और खर्चे की दृष्टि से वे चिंतित थे। अतः उन्होंने शिवतारकर से, यदि संभव हो तो कुछ रकम भेजने को कहा।

जुलाई के मध्य तक, डॉ. अम्बेडकर के स्वास्थ्य में सुधार हो गया था, उन्होंने ड्रेस्डेन से प्रस्थान किया और एक सप्ताह के लिए बर्लिन में रूक गए जहां उस समय हिटलर का उदय हो रहा था। बर्लिन से उन्होंने लिखा कि वे वियना जाएंगे और वेनिस से स्टीमर गंगे में बैठेंगे। लेकिन इस बार उन्होंने कहा कि उन्हें स्वागत की औपचारिकताओं की चिंता नहीं करनी चाहिए। ऐसा मनुष्य का स्वभाव है। जिसे जो नहीं मिला है, उसके लिए वह लालायित रहता है। अपने विद्यार्थी जीवन में डॉ. अम्बेडकर ने जब कभी भी विदेश के लिए प्रस्थान किये, किसी ने भी उनके प्रस्थान और आगमन की ओर ध्यान नहीं दिया। लेकिन गोल मेज सम्मेलन के दिनों के बाद से, उनका प्रस्थान और आगमन उनके हजारों समर्थकों के लिए तथा पत्रकारों के लिए विदाई एवं स्वागत का अवसर बन गया था। डॉ. अम्बेडकर 17 अगस्त को बंबई पहुंचे।’’ ख्1,

17 अगस्त, 1932 को ब्रिटिश प्रधान मंत्री ने साम्प्रदायिक प्रश्न पर अपने निर्णय की घोषणा की। उस विनिश्चय का छूआछूत से जुड़ा हिस्सा नीचे दिया गया है :

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गोल मेज सम्मेलन के दूसरे सत्र की समाप्ति पर महामहिम सम्राट की सरकार की ओर से गत 1 दिसम्बर को प्रधान मंत्री द्वारा अपने बयान में, जिसकी तत्काल बाद में संसद के दोनों सदनों ने पुष्टि कर दी थी, यह स्पष्ट कर दिया गया था कि अगर साम्प्रदायिक प्रश्नों पर सभी दल एक स्वीकार्य समझौता नहीं कर पाते हैं, जिसे हल कर पाने में सम्मेलन भी असफल रहा है तो महामहिम सम्राट की सरकार इस बारे में कृतसंकल्प है कि इस वजह से भारत द्वारा संविधान निर्माण की प्रगति में

  1. कीर, पृष्ठ 202-204 ।