खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 149

132 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

जब तक कि इस प्रांत के सर्वाधिक विक्षुब्ध एवं जोरदार दावों के बारे में मेरा समाधान न करा दिया जाए। यह अन्याय तब सर्वाधिक जघन्य हो जाता है जब यह बताया जाता है कि भारतीय ईसाई और आंग्ल-भारतीय जिनके दलित वर्गों की जनसंख्या दशांश भी नहीं है और जिन पर सामाजिक शिकायतों का साया भी नहीं है, में से पहले वर्ग को दो विशेष सीटें तथा बाद के वर्ग को एक सीट दी गई है। मुझे डर है कि इन अन्यायों के कारण अखिल भारतीय दलित वर्ग संघ, जिसे इस प्रश्न पर विचार करना है, इस अधिनिर्णय को स्वीकार करने के खिलाफ न हो जाए।’ ख्1,

भारत लौटने पर, गांधी को 4 जनवरी को गिरफ्तार कर लिया गया था। गांधी ने राजनीति में अछूत हिन्दुओं को सवर्ण हिन्दुओं के साथ जोड़ने की अपनी लड़ाई को छोड़ा नहीं था। मार्च के प्रारंभ में, उन्होंने यरवदा जेल से ब्रिटिश मंत्रिमंडल को सूचित किया कि मैं अपनी जान देकर भी सवर्ण हिन्दुओं से अछूत हिन्दुओं को अलग करने का विरोध करूंगा। जब साम्प्रदायिक अधिनिर्णय घोषित हुआ और अछूतों के लिए अलग निर्वाचकमंडल की प्रणाली मंजूर हुई तब उन्होंने अपने इस संकल्प की घोषणा की कि यदि दलित वर्गों के लिए अलग निर्वाचनमंडल का दर्जा समाप्त नहीं किया गया तो मैं आमरण अनशन करूंगा। फिर भी सिद्धांत के नाते उन्होंने, ईसाइयों, मुसलमानों और सिखों को दिए जा रहे अलग निर्वाचकमंडल के दर्जे के विरुद्ध एक शब्द भी नहीं कहा।

दलित वर्गों को अलग निर्वाचकमंडल का दर्जा मंजूर करने के खिलाफ गांधी द्वारा आमरण अनशन को भी किसी ने औचित्यपूर्ण नहीं ठहराया।’’ ख्2,

इस बारे में डॉ. अम्बेडकर ने कहा, -

‘‘श्री गांधी को यह पता चल गया था कि उनकी धमकी का कोई असर पड़ने वाला नहीं है। उन्होंने इस बात की परवाह नहीं की कि मध्यस्थता हेतु प्रधान मंत्री से अनुरोध करने वाले मांग-पत्र पर उन्होंने भी हस्ताक्षर किए थे। वे यह भूल गए कि हस्ताक्षरकर्ता के रूप में वे इस अधिनिर्णय को स्वीकार करने के लिए बाध्य हैं। पहले उन्होंने साम्प्रदायिक अधिनिर्णय की शर्तों में संशोधन करने की कोशिश की। तद्नुसार, उन्होंने निम्न पत्र प्रधान मंत्री को भेजा :-

यरवदा सेंट्रल जेल

18 अगस्त, 1932

‘‘इस बारे में कोई संदेह नहीं हो सकता कि दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर सर सैम्यूल होरे को संबोधित दिनांक 11 मार्च का मेरा पत्र उन्होंने आपको और 1.2. दि फ्री प्रेस जरनल, दिनांक 24 अगस्त, 1932 ।कीर, पृष्ठ 204-05