खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 150

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मंत्रिमंडल को दिखाया है। उस पत्र को इस पत्र का भाग समझा जाए और इस पत्र के साथ पढ़ा जाए।’’

‘‘अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व पर ब्रिटिश सरकार के निर्णय को मैंने पढ़ा है और इस पर चिंतन भी किया है। सर सैम्यूल होरे को भेजे गए मेरे पत्र और सेंट जेम्स पैलेस में 13 नवम्बर, 1931 को आयोजित गोल मेज सम्मेलन की अल्पसंख्यक समिति की बैठक में मेरी घोषणा के अनुसरण में, मैं अपनी जान देकर आपके फैसले का विरोध करूंगा। ऐसा मैं यह घोषणा करके करूंगा कि मैं आमरण अनशन करूंगा और किसी भी प्रकार का कोई भोजन ग्रहण नहीं करूंगा, मैं नमक या सोडे के साथ या इनके बगैर केवल जल ग्रहण करूंगा। यह व्रत तब तक चलेगा जब तक इसके चलते ब्रिटिश सरकार अपने प्रस्ताव द्वारा या जनता की राय के दबाव में आकर अपने निर्णय को पुनरक्षित न कर ले और दलित वर्गों के लिए साम्प्रदायिक निर्वाचकमंडल की अपनी स्कीम को वापिस न ले ले जिनके प्रतिनिधियों का चुनाव साधारण मताधिकार के अधीन आम निर्वाचकमंडल द्वारा किया जाना चाहिए, भले ही वह कितना भी व्यापक क्यों न हो।

‘‘प्रस्तावित अनशन सामान्य परिस्थितियों में आगामी 20 सितम्बर की दोपहर से प्रारंभ होगा और तब तक चलेगा जब तक ऊपर बताई गई रीति के अनुसार उक्त निर्णय को इस बीच पुनरीक्षित नहीं कर लिया जाता।’’

‘‘मैं यहां के प्राधिकारियों से कहूंगा कि वे मेरे इस पत्र का पाठ आपको केवल द्वारा भिजवा दें ताकि आपको पर्याप्त समय मिल सके। लेकिन किसी भी परिस्थिति में, यदि सबसे धीमी गति से यह पत्र आप तक पहुंचता है तो भी आपको पर्याप्त समय मिल जाए।’’

‘‘मैं यह भी कहूंगा कि यह पत्र और सर सैम्युल होरे को संबोधित मेरे उपर्युक्त संदर्भित पत्र को यथा शीघ्र प्रकाशित किया जाए। मैंने अपनी ओर से जेल के नियमों का ईमानदारी से पालन किया है और मैंने अपनी इच्छा या इन दो पत्रों की विषय-वस्तु से, अपने दो साथियों सरदार वल्लभभाई पटेल तथा श्री महादेव देसाई को छोड़कर किसी अन्य को अवगत नहीं कराया है। यदि आपकी ओर से संभव हो तो मैं यह चाहूंगा कि मेरे पत्रों द्वारा लोगों की राय प्रभावित हो। अतः मैं इनके शीघ्र प्रकाशन हेतु अनुरोध करता हूँ।’’

‘‘मुझे अपने विनिश्चय पर खेद है। लेकिन मैं जिस धर्म में विश्वास रखता हूं, उसे ध्यान में रखते हुए मेरे पास कोई और विकल्प नहीं है। जैसा कि मैंने सर सैम्युल होरे को लिखे पत्र में कहा है, यदि महामहिम सम्राट की सरकार स्वयं को परेशानी से बचाने के लिए मुझे रिहा करने का फैसला लेती है तो भी मेरा अनशन