134 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
चलता रहेगा। चूंकि अब मैं और किसी तरीके से इस फैसले का विरोध नहीं कर सकता; और मैं एक सम्मानित रिहाई के अलावा किसी अन्य तरीके से रिहाई कराने की कोई इच्छा नहीं रखता।’’
‘‘ऐसा हो सकता है कि दलित वर्गों के लिए अलग निर्वाचकमंडल प्रणाली के बारे में मेरा फैसला विकृत हो और यह कि मैं बिल्कुल गलत होऊं तथा यह उनके तथा हिन्दूवाद के लिए हानिकारक हो। यदि ऐसा है तो मेरे जीवन के दर्शन के अन्य भागों के संबंध में भी मेरे ठीक होने की संभावना नहीं है। उस स्थिति में, अनशन द्वारा मेरी मृत्यु त्रुटि का प्रायश्चित होगी और उन असंख्य पुरुषों तथा महिलाओं पर से बोझ उठ जाएगा जो मुझमेंं बालसुलभ विश्वास रखते हैं। यदि मेरा फैसला सही है और मुझे इस बारे में तनिक भी संदेह नहीं है तो प्रस्तावित कदम जीवन के उस कार्यक्रम को पूरा करने के लिए है जिसके लिए मैंने पच्चीस वर्ष से भी अधिक समय तक प्रयास किया है लेकिन मुझे पर्याप्त सफलता नहीं मिली है।
मैं हूँ,
आपका विश्वसनीय मित्र,
एम. के. गांधी’’ ख्1,
यह दलित वर्गों के बारे में महात्मा गांधी के विरोधाभास को सिद्ध करता है।
इस बीच, गांधी जी से सरदार वल्लभभाई पटेल 6 सितम्बर, 1932 को यरवदा जेल में मिले और इस मुद्दे पर उनसे बातचीत की। *
‘‘जैसा कि स्वाभाविक ही था, गांधी की घोषणा से पूरा देश भौचक्का रह गया। जनता की ओर से गाँधी और सरकार से अपील की गई, प्रेस में बयान जारी किए गए और प्रार्थनाएं की गईं। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जैसे नेताओं ने कहा कि हिन्दूवाद की परख हो रही है। समूचे हिन्दू समाजों में भ्रम तथा घबराहट की स्थिति थी, ऐसा इसलिए नहीं था कि सवर्ण हिन्दू और उनके नेता दलित वर्गों के साथ की गई क्रूरता के लिए शर्मसार थे, बल्कि इसलिए कि उनके राजनीतिक नायक, उनके राजनीतिक मोचक का जीवन खतरे में है। हिन्दू के चरित्र में परम्परागत दुखद प्रवृत्ति प्रभावशाली रही और वे अधीर हो गए।’’
पंडित मालवीय ने शिमला से अपने इस इरादे की घोषणा की कि वे 19 सितम्बर को मुंबई में हिन्दू नेताओं के एक सम्मेलन का आयोजन इस गतिरोध को समाप्त
- * लेख तथा भाषण, खंड 9, पृष्ठ 82-83।परिषिष्ट-4 देखिए।