136 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने घोषणा की कि, ‘‘मैं इन राजनीतिक उठा-पटक की परवाह नहीं करता।’’
उन्होंने आगे कहा कि, ‘‘महात्मा गाँधी की आमरण अनशन की यह धमकी कोई नैतिक लड़ाई न होकर मात्र एक राजनीतिक चाल है। यह तो मैं समझ सकता हूँ कि एक व्यक्ति अपने राजनीतिक विरोधी से अपनी ईमानदारी का विश्वास दिलाकर समान शर्तों पर बातचीत करे, लेकिन मैं इन हथकंडों से कभी भी प्रभावित होने वाला नहीं हूँ।’’
‘‘मैं अपने निर्णय पर स्थिर हूं और यदि श्री गांधी हिन्दू समुदाय के हित के लिए अपनी जान देकर लड़ना चाहते हैं तो दलित वर्ग भी अपने हितों की सुरक्षा करने के लिए अपनी जान दे कर लड़ने को बाध्य होंगे।’’
श्री एम. सी. राजा द्वारा व्यक्त इस विचार के संदर्भ में कि अगर डॉ. अम्बेडकर पृथक निर्वाचकमंडल प्रणाली की अपनी मांग को छोड़कर आरक्षित सीटों सहित संयुक्त निर्वाचकमंडल प्रणाली को मान लेते हैं तो इस स्थिति से उबरा जा सकता है, डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि वे इसके लिए सहमत नही हैं।’’ ख्1,
श्री गांधी ने 15 सितम्बर, 1932 को बंबई के गवर्नर को एक पत्र लिखकर आमरण अनशन के निर्णय के कारणों को स्पष्ट किया। उक्त पत्र 21 मार्च को प्रेस को प्रकाशनार्थ भेजा गया। उक्त पत्र में उन्होंने कहा कि :
‘‘मेरे अनशन की सूक्ष्म प्रासंगिकता है। दलित वर्गों का प्रश्न प्रमुख रूप से एक धार्मिक मामला है, मैं इसे विशेष रूप से अपना स्वयं का मानता हूं क्योंकि मैंने आजीवन इस पर एकाग्रता से विचार किया है। यह एक पवित्र व्यक्तिगत विश्वास है जिससे मैं कभी जी नहीं चुराऊंगा।’’ ख्2,
इस बारे में अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए, डा. अम्बेडकर ने द टाइम्स आफ इंडिया को एक पत्र लिखा। पत्र इस प्रकार है -
सम्पादक,
‘‘टाइम्स ऑफ इंडिया’’
महोदय,
1.2 द बम्बई क्रानिकल, दिनांक 14 सितम्बर, 1932 ।खैरमोदे, खंड 5, पृष्ठ 26 ।