138 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
हिन्दू नेताओं के सम्मेलन से एक दिन पहले, डॉ. अम्बेडकर ने प्रेस को एक बयान जारी किया जिसमें उन्होंने कहा, ‘‘जहां तक मेरा संबंध है, मैं किसी भी बात पर विचार करने का इच्छुक हूं लेकिन मैं नहीं चाहूंगा कि दलित वर्गों के अधिकारों में किसी भी प्रकार से कोई कटौती करने की अनुमति दी जाए। एक खालीपन से किसी सम्मेलन का आयोजन करने या मुद्दों पर बिना विशिष्ट जानकारी के चर्चा करने का कोई लाभ नहीं है।’’ उन्होंने इसे खुलकर अहमदाबाद से आए दलित वर्गों के एक प्रतिनिधिमंडल और भारतीय करोड़पति सेठ बालचंद हीराचंद के साथ अपनी भेटवार्ता से जोड़ दिया। इन्होंने उन्हें बताया कि गांधी अपने प्रस्ताव पर ब्रिटिश प्रधान मंत्री से बात कर सकते थे; चूंकि वे कोई प्रस्ताव प्रस्तुत नहीं कर रहे थे, दोष उन्हीं का है।
आगंतुक, नेता और मित्र डॉ. अम्बेडकर से मिलने आने लगे। पहले मिलने वाले इन आगंतुकों में एक ठक्कर थे जिन्होंने डॉ. अम्बेडकर के साथ राज्य समिति में कार्य किया था। वे इस मामले में बात करने आए थे। डॉ. अम्बेडकर ने जिनके लिए समय ही ज्ञान तथा एक मूल्यवान वस्तु है, कहा कि वे एक महत्वपूर्ण आपराधिक मामले का अध्ययन करने में व्यस्त हैं और इसलिए उन्होंने ठक्कर से पूछा कि उन्हें कितना समय चाहिए। ठक्कर ने जवाब दिया कि उन्हें तकरीबन एक घंटे की जरूरत है। डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि वे सिर्फ पांच मिनट देंगे। ठक्कर ने और समय मांगा/गणितीय संक्षिप्तता के साथ बैठक समाप्त हो गई तथा डॉ. अम्बेडकर अंदर चले गए। अगले दिन ठक्कर फिर डॉ. अम्बेडकर से मिले। डॉ. अम्बेकर के विरुद्ध एक प्रचंड अभियान शुरू किया गया।’’ ख्1,
हिन्दू नेताओं की बैठक से एक दिन पहले अर्थात् 19 सितम्बर, 1932 को डॉ. अम्बेडकर ने प्रेस को एक और बयान जारी किया। इस बयान का पूरा पाठ नीचे दिया गया है - सम्पादकगण
‘‘मुझे यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि मैं महात्मा गांधी, सर सैम्युल होरे और प्रधान मंत्री के बीच के पत्राचार को पढ़कर आश्चर्यजकित रह गया था जो हाल ही में समाचार-पत्रों में प्रकाशित हुआ है जिसमें उन्होंने आमरण अनशन करने के अपने संकल्प को व्यक्त किया है। यह अनशन तब तक जारी रहेगा जब तक कि ब्रिटिश सरकार अपनी ओर से या फिर जनता की राय के दबाव में आकर अपनी राय को संशोधित नहीं करती और दलित वर्गों के साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व की अपनी स्कीम को वापिस नहीं ले लेती। महात्मा द्वारा आत्मदाह की प्रतिज्ञा ने मुझे जिस अवांछनीय
- * कीर, पृष्ठ 206-07।लेख तथा भाषण, खंड 9, पृष्ठ 77-78 देखिए।