खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 156

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स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है, उसकी आसानी से कल्पना की जा सकती है।

यह मेरी इस धारणा को आगे बढ़ाता है कि श्री गाँधी साम्प्रदायिक प्रश्न से उठने वाले एक ऐसे मुद्दे के लिए अपने प्राणों को दाव पर क्यों लगा रहे हैं जिसके बारे में गोल मेज सम्मेलन में यह कहा था कि तुलनात्मक दृष्टि से यह एक कम महत्व का मुद्दा है। वास्तव में, साम्प्रदायिक प्रश्न पर विचार करने की श्री गांधी की शैली की भाषा को अपनाना भारत के संविधान की पुस्तक का एक परिशिष्ट मात्र था न कि मुख्य अध्याय। यह औचित्यपूर्ण होता यदि श्री गांधी ने यह कदम देश के लिए आजादी हासिल करने के लिए उठाया होता जिसपर वे गोल मेज सम्मेलन की बहसों के दौरान बल देते रहे हैं।

यह भी एक दुखद आश्चर्य है कि श्री गांधी को अपने आत्मदाह के लिए साम्प्रदायिक अधिनिर्णय में दलित वर्गों के लिए विशेष प्रतिनिधित्व का ही एकमात्र बहाना मिला है। पृथक निर्वाचकमंडल का दर्जा न केवल दलित वर्गों को ही दिया गया है, बल्कि भारतीय ईसाइयों, आंग्ल-भारतीयों, यूरोपियनों तथा साथ ही साथ मुसलमानों एवं सिखों को भी दिया गया है। पृथक निर्वाचकमंडल का दर्जा भूस्वामियों, श्रमिकों और व्यापारियों को भी दिया गया है। श्री गांधी ने मुसलमानों और सिखों को छोड़कर अन्य सभी वर्गों तथा पंथों के विशेष प्रतिनिधित्व का विरोध करने की घोषणा की है। साथ ही, श्री गांधी अब दलित वर्गों को छोड़कर हर किसी को विशेष निर्वाचकमंडल का दर्जा सुरक्षित रखने के पक्ष में हैं।

दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व की व्यवस्था करने के परिणामों के बारे में श्री गांधी द्वारा व्यक्त किया गया भय मेरे विचार से मात्र काल्पनिक है। यदि मुसलमानों और सिखों को प्रथक निर्वाचकमंडल के रूप में स्थापित करने से देश विभाजित नहीं हो सकता है तो दलित वर्गों को प्रथक निर्वाचकमंडल का दर्जा देने से हिन्दू समाज कैसे विभाजित हो सकता है। उनका अंतःकरण तब जागृत नहीं होता जब दलित वर्गों को छोड़कर अन्य वर्गों तथा समुदायों को विशेष निर्वाचकमंडल का दर्जा देने से देश का विभाजन होता है।

मुझे विश्वास है कि कई लोग यह सोचते हैं कि स्वराज संविधान के अधीन बहुसंख्या के अत्याचारों से अपना बचाव करने के लिए यदि कोई वर्ग विशेष राजनीतिक अधिकार का हकदार है तो वह दलित वर्ग ही है। यह वह वर्ग है जो निस्संदेह जीवनयापन के संघर्ष में स्वयं को टिकाए रखने की स्थिति में नहीं है। जिस धर्म से वे जुड़े हैं वह उन्हें एक सम्मानित स्थान देने की बजाए कोढ़ी का कलंक लगाता है जो एक साधारण संसर्ग के भी योग्य नहीं है। आर्थिक दृष्टि से, यह एक ऐसा वर्ग है जो अपनी रोजी रोटी कमाने के लिए उच्च जाति के हिन्दुओं पर पूर्णतः निर्भर है