140 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
और जीवनयापन के लिए कोई स्वतंत्र मार्ग नहीं है। हिन्दुओं के सामाजिक पूर्वाग्रहों के कारण उनके लिए न केवल प्रगति का प्रत्येक मार्ग बंद है बल्कि पूरा हिन्दू समाज इस दिशा में निश्चित ही प्रयासरत है कि सभी संभावित दरवाजे बंद कर दिए जाएं ताकि दलित वर्गों को अपना जीवन स्तर ऊपर उठाने के लिए कोई अवसर ही न मिले। वास्तव में यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि प्रत्येक गांव में सवर्ण हिन्दू आपस में विभाजित हैं और वे उन दलित वर्गों द्वारा किए गए किसी भी प्रयास को कठोरता से निष्फल करने के स्थायी षडयंत्र सदैव रचते रहते हैं जो साधारण भारतीय नागरिकों का एक छोटा एवं छिन्न-भिन्न निकाय है।
इन परिस्थितियों में, सही सोच वाले सभी व्यक्तियों के लिए यह उचित रहेगा कि वे यह मान लें कि इतने अपंग समुदाय के लिए सांविधिक राजनीतिक अधिकारों में कुछ हिस्सा होना परम आवश्यक है ताकि वे जीवन के संघर्ष में सफल हो सकें और संगठित अत्याचार से स्वयं की रक्षा कर सकें।
मैं सोचता हूं कि नए संविधान में दलित वर्गों को यथासंभव अधिकाधिक राजनीतिक अधिकार दिलाने के लिए उनके एक शुभचिन्तक के रूप में जी-जान से संघर्ष करूं। लेकिन महात्मा का सोचने का तरीका अनोखा है और निश्चय ही मेरी समझ से बाहर है। उन्होंने साम्प्रदायिक अधिनिर्णय के अंतर्गत दलित वर्गों के थोड़े-बहुत राजनीतिक अधिकारों की वृद्धि करने के लिए तो कोई प्रयास किया नहीं बल्कि जो थोड़ा-बहुत उन्हें मिला है उससे भी उन्हें वंचित करने के लिए उन्होंने अपने जीवन को ही दांव पर लगा दिया है। महात्मा ने दलित वर्गों के राजनीतिक अस्तित्व को पूरी तरह से समाप्त करने के लिए ऐसा कदम पहली बार नहीं उठाया है। काफी समय पहले अल्पसंख्यक समझौता हुआ था, महात्मा ने मुसलमानों के साथ एक समझौता करने की कोशिश की थी ताकि दलित वर्गों के दावे को खारिज किया जा सके। मुसलमानों ने अपनी ओर से जो 14 दावे प्रस्तुत किए थे, महात्मा ने उन सभी दावों को पेशकश की और बदले में उनसे मेरे द्वारा दलित वर्गों की ओर से किए गए सामाजिक प्रतिनिधित्व की मांग का विरोध करने के लिए अपने साथ आने को कहा।
इस बात का श्रेय मुसलमानों को जाता है कि उन्होंने ऐसे किसी कुकृत्य से स्वयं को जोड़ने से इंकार कर दिया और मुसलमानों एवं श्री गांधी द्वारा संयुक्त विरोध के परिणामस्वरूप दलित वर्गों को एक विपत्ति में फँसने से बचा लिया।
मैं यह समझ नहीं पा रहा हूं कि श्री गांधी द्वारा साम्प्रदायिक अधिनिर्णय के प्रति इस विद्वेष का आधार क्या है। उनका कहना है कि साम्प्रदायिक अधिनिर्णय ने हिन्दू समाज को अलग-थलग कर दिया है। दूसरी ओर, डॉ. मुंजे जो कि हिन्दू आंदोलन