खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 158

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के एक काफी प्रबल समर्थक हैं और इनके हितों के एक उग्र हिमायती है, इस मामले को एक बिल्कुल ही अलग दृष्टिकोण से देखते हैं। लंदन से लौटने के बाद से डॉ. मुंजे अपने भाषणों में इस बात पर जोर देते रहे हैं कि साम्प्रदायिक अधिनिर्णय दलित वर्गों तथा हिन्दुओं के बीच कोई अलगाव पैदा नहीं करता है। वास्तव में, वे तो यह शेखी बधार रहे हैं कि उन्होंने हिन्दुओं में से दलित वर्गों को राजनीतिक रूप से अलग करने के मेरे प्रयास में मुझे परास्त कर दिया है। मुझे विश्वास है कि डॉ. मुंजे साम्प्रदायिक अधिनिर्णय की सही व्याख्या कर रहे हैं, लेकिन मैं इस बारे में आश्वस्त नहीं हूं कि इसका श्रेय यथार्थ रूप से डॉ. मुंजे को जाए। अतः यह आश्चर्यजनक है कि महात्मा गांधी जो राष्ट्रवादी हैं और जो सम्प्रदायवादी के रूप में जाने नहीं जाते, साम्प्रदायिक अधिनिर्णय को, जहां तक इसका संबंध दलित वर्ग से है, इस प्रकार से पढ़ें जो डा. मुंजे जैसे सम्प्रदायवादी से काफी प्रतिकूल है। यदि डॉ. मुंजे को ऐसा नहीं लगता कि साम्प्रदायिक अधिनिर्णय हिन्दुओं में से दलित वर्गों को अलग नहीं करता तो महात्मा को इससे काफी संतुष्ट होना चाहिए।

मेरी राय में साम्प्रदायिक अधिनिर्णय से केवल हिन्दुओं को ही संतुष्ट नहीं होना चाहिए बल्कि राव बहादुर राजा, श्री बालू या श्री गवई जैसे दलित वर्गों के अलग-अलग व्यक्तियों को भी संतुष्ट होना चाहिए। एसेम्बली में डा. राजा के विस्फोटक विचारों नें मेरा बहुत मनोरंजन किया। प्रथक निर्वाचकमंडल का एक प्रबल समर्थक और सवर्ण हिन्दू के अत्याचारों का सबसे कटु तथा ओजस्वी आलोचक अब संयुक्त निर्वाचकमंडल प्रणाली और हिन्दू के प्रति प्रेम की वकालत कर रहा है। इसमें से कितना गोल मेज सम्मेलन से इन्हें बाहर रखकर जिस गुमनामी में उन्हें छोड़ दिया गया था उससे स्वयं को बाहर निकालने की उनकी स्वाभाविक इच्छा के कारण और इसमें से कितना उनके विश्वास में निष्कपट परिवर्तन की वजह से हुआ है, उसके बारे में मैं चर्चा नहीं करना चाहता।

श्री राजा साम्प्रदायिक अधिनिर्णय की आलोचना द्वारा जिन बिन्दुओं पर राग अलाप रहे हैं, वे दो हैं, एक यह है कि दलित वर्गों को जनसंख्या के आधार पर पात्रता से कम सीटें मिली हैं और दूसरा यह है कि दलित वर्गों को हिन्दुओं से अलग किया गया है।

मैं पहली शिकायत से सहमत हूं लेकिन जब राव बहादुर गोल मेज सम्मेलन में दलित वर्गों का प्रतिनिधित्व करने वालों पर अपने अधिकारों को थोपने का आरोप लगाना प्रारंभ करते हैं तब मैं यह बताने के लिए बाध्य हो जाता हूं कि श्री राजा ने भारतीय केंद्रीय समिति के एक सदस्य के रूप में क्या किया। समिति की उस रिपोर्ट में दलित वर्गों को मद्रास में 150 में से 10 सीटें बंबई में 114 में से 8 सीटें, बंगाल में 200 में