खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 159

142 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

से 8 सीटें; उत्तर प्रदेश में 182 में से 8 सीटें; पंजाब में 150 में से 6 सीटें; बिहार और उड़ीसा में 150 में से 6 सीटें; सी.पी. में 125 में से 8 सीटें और असम में दलित वर्गों और देशी एवं आदिम जातियों को 75 में से 9 सीटें दी गई थीं। मैं यह बताकर इस विवरण पर अधिक बोझ नहीं डालना चाहता कि इस वितरण की जनसंख्या अनुपात से किस प्रकार से तुलना की जाए। लेकिन निस्संदेह इतना अवश्य स्पष्ट है कि दलित वर्गों को अत्यधिक अल्प प्रतिनिधित्व मिला है। श्री राजा भी सीटों के इस बंटवारे के एक पक्षकार हैं। निश्चय ही श्री राजा को साम्प्रदायिक अधिनिर्णय की आलोचना करने और दूसरों पर दोषारोपण करने से पहले इस बाबत अपनी याददाश्त ताजा कर लेनी चाहिए कि बिना कोई विरोध किए दलित वर्गों की ओर से उन्होंने भारतीय केंद्रीय समिति के सदस्य के रूप में क्या स्वीकार किया था। यदि उनके लिए प्रतिनिधित्व हेतु जनसंख्या अनुपात दलित वर्गों का एक स्वाभाविक अधिकार है और उनका संरक्षण करने के लिए उन्हें पूरा-पूरा हिस्सा मिलना एक आवश्यकता है तो श्री राजा ने केंद्रीय समिति में इस पर तब जोर क्यों नहीं डाला जब उन्हें ऐसा करने का अवसर मिला था?

उनका यह दावा कि साम्प्रदायिक अधिनिर्णय में दलित वर्गों को सवर्ण हिन्दुओं से अलग रखा गया है, यह एक ऐसा दृष्टिकोण है जिससे मैं सहमत नहीं हूं। यदि श्री राजा को पृथक निर्वाचकमंडल प्रणाली से कोई नैतिक आपत्ति है तो उन पर ऐसा कोई दबाव नहीं है कि वे पृथक निर्वाचकमंडल के एक उम्मीदवार के रूप में लड़ें। आम चुनाव में एक उम्मीदवार के रूप में खड़ा होने और उसमें मतदान करने का अवसर उन्हें मिलेगा तथा श्री राजा इसका लाभ उठाने के लिए स्वतंत्र हैं। श्री राजा पूरे जोर से यह चिल्ला रहे हैं कि दलित वर्गों को इस बारे में आश्वस्त किया जाए कि सवर्ण हिन्दुओं का दिल दलित वर्गों के लिए बिल्कुल बदल गया है। उनके पास इस तथ्य को उन दलित वर्गों की संतुष्टि के लिए सिद्ध करने का अवसर होगा जो उनकी इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं हैं कि वे एक साधारण निर्वाचन-क्षेत्र से स्वयं को निर्वाचित कराएंगे। जो हिन्दू दलित वर्गों के लिए प्रेम और सहानुभूति का दावा करते हैं उन्हें भी श्री राजा को विधायिका के लिए निर्वाचित कराकर अपने सदाशय को सिद्ध करने का अवसर मिलेगा।

अतः मेरी राय में साम्प्रदायिक अधिनिर्णय पृथक निर्वाचकमंडल प्रणाली को चाहने वालों और संयुक्त निर्वाचकमंडल प्रणाली को चाहने वालों को भी संतुष्ट करेगा। इस दृष्टि से, यह एक समझौता ही है और इसे इसी रूप में स्वीकार करना चाहिए। जहां तक महात्मा का संबंध है, मैं नहीं जानता वे क्या चाहते हैं। यह मान लिया जाए कि महात्मा पृथक निर्वाचकमंडल प्रणाली का विरोध करते हैं लेकिन वे संयुक्त निर्वाचकमंडल प्रणाली तथा आरक्षित सीटों की प्रणाली के विरोध में नहीं हैं। यह एक भारी गलती