खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 160

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है। आज उनके विचार चाहे कुछ भी हों, लंदन में संयुक्त निर्वाचकमंडल प्रणाली द्वारा या पृथक निर्वाचकमंडल प्रणाली द्वारा दलित वर्गों के लिए विशेष प्रतिनिधित्व की किसी प्रणाली के एकदम खिलाफ थे। वयस्क मताधिकार पर आधारित आम चुनाव में मतदान के अधिकार के अलावा, वे दलित वर्गों के लिए विधायिकाओं में प्रतिनिधित्व हासिल करके उन्हें और कुछ नहीं देना चाहते थे। उन्होंने प्रथमतः इस रुख को अपनाया था। गोल मेज सम्मेलन की समाप्ति पर उन्होंने मुझे एक योजना का सुझाव दिया था जिसके बारे में उन्होंने कहा था कि वे इस पर विचार करने को तैयार हैं। यह योजना मात्र परम्परागत थी और इसे कोई संवैधानिक स्वीकृति प्राप्त नहीं थी तथा निर्वाचन कानून में दलित वर्गों के लिए कोई भी सीट आरक्षित नहीं थी।

वह योजना इस प्रकार थी :-

आम चुनाव में दलित वर्ग के उम्मीदवार अन्य उच्च जाति के हिन्दू उम्मीदवारों के विरुद्ध खड़े हो सकते हैं। यदि दलित वर्ग का कोई उम्मीदवार चुनाव में हार जाता है तो वह एक चुनाव याचिका दायर करे और यह फैसला करा ले कि अछूत होने की वजह से उसकी पराजय हुई थी। यदि ऐसा फैसला हो जाता है, तो महात्मा ने कहा कि वह किसी हिन्दू सदस्य को त्यागपत्र देने के लिए प्रेरित करे और इस प्रकार एक सीट खाली हो जाएगी। वहां पर फिर से चुनाव होगा जिसमें दलित वर्ग का पराजित उम्मीदवार या दलित वर्ग का कोई अन्य उम्मीदवार अपना भाग्य हिन्दू उम्मीदवारों के खिलाफ आजमा सकता है। यदि वह फिर भी पराजित हो जाता है तो वह ऐसा फैसला फिर से करा सकता है कि अछूत होने की वजह से उसकी पराजय हुई और यह सिलसिला अनंत काल तक चल सकता है। मैं इन तथ्यों से इसलिए अवगत करा रहा हूं क्योंकि अब कुछ लोगों का यह मानना है कि संयुक्त निर्वाचकमंडल प्रणाली और आरक्षित सीटों की प्रणाली से महात्मा का अंतः करण संतुष्ट हो जाएगा। इससे यह पता चल जाएगा कि मैं इस बात पर क्यों जोर दे रहा हूं कि इस प्रश्न पर विचार-विमर्श करने का तब तक कोई फायदा नहीं होगा जब तक गांधी के वास्तविक प्रस्ताव प्रस्तुत नहीं किए जाते हैं।

तथापि, मैं यह बता दूं कि मैं महात्मा के इस आश्वासन को स्वीकार नहीं कर सकता कि वे और उनकी कांग्रेस आवश्यक कदम उठाएगी। मैं अपने लोगों के संरक्षण के इतने महत्वपूर्ण प्रश्न को परम्परा तथा सहानुभूति के भरोसे नहीं छोड़ सकता। महात्मा कोई अमर व्यक्ति नहीं है, और कांग्रेस के लिए यह मान लेते हैं कि यह कोई द्वेषपूर्ण ताकत नहीं है, फिर भी इसका कोई स्थायी अस्तित्व नहीं है। भारत में कई महात्मा हुए हैं जिनका एकमात्र उद्देश्य छूआछूत को दूर करना और दलित वर्गों का उत्थान करना तथा आत्मसात करना था; लेकिन इनमें से कोई भी अपने उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर