144 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सका। महात्मा आए और महात्मा चले गए। लेकिन अछूत तो अछूत ही रहे।
मुझे महाद तथा नासिक में हुए संघर्षों में सुधारों की गति और हिन्दू सुधारकों के विश्वास का काफी अनुभव है। मैं यह कह सकता हूं कि दलित वर्गों का कोई भी शुभचिंतक ऐसे विश्वासघाती कंधों के भरोसे दलित वर्गों के उत्थान की अनुमति कभी नहीं देगा। जो सुधारक संकट की घड़ी में अपने सजातीय लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने की बजाए अपने सिद्धांतों की बलि देने को वरीयता देते हैं, वे दलित वर्गों के लिए किसी काम के नहीं हो सकते।
अतः मैं अपने लोगों के संरक्षण के लिए एक सांविधिक गारंटी पर जोर डालने के लिए बाध्य हूँ। यदि श्री गाँधी साम्प्रदायिक अधिनिर्णय में परिवर्तन कराना चाहते हैं तो उन्हें अपने प्रस्ताव प्रस्तुत करने होंगे और यह सिद्ध करना होगा कि वे अधिनिर्णय के अंतर्गत उपलब्ध कराई गई गारंटी से बेहतर गारंटी उपलब्ध कराएंगे।
मैं आशा करता हूँ कि महात्मा ने जो अतिवादी कदम उठाने की सोची है उससे वे बाज आएंगे। हम पृथक निर्वाचकमंडल की मांग करते हुए, हिन्दू समाज को कोई क्षति नहीं पहुंचाना चाहते। जब हम पृथक निर्वाचकमंडल प्रणाली को चुनते हैं तब हम ऐसा इसलिए करते हैं ताकि हमारे भाग्य को प्रभावित करने वाले मुद्दों में सवर्ण हिन्दुओं की स्वेच्छा पर पूर्ण निर्भरता से बचा जा सके। महात्मा की भांति, हम भी गलती करने के अपने अधिकार का दावा करते हैं, और हम उनसे यह अपेक्षा करते हैं कि वे हमें हमारे उस अधिकार से वंचित न करें। उन्हें किसी अन्य अधिक महत्वपूर्ण मुद्दे के लिए आमरण अनशन करना चाहिए। मैं महात्मा द्वारा इस अतिवादी कदम को उठाने की बात सोचने के औचित्य को समझ सकता था यदि उन्होंने यह कदम हिन्दू और मुसलमानों या दलित वर्गों के बीच दंगों को रोकने के लिए अथवा किसी अन्य राष्ट्रीय प्रयोजन के लिए उठाया होता। निश्चय ही इससे दलित वर्गों का भाग्य बदल नहीं सकता। महात्मा जानते हैं या नहीं, उनके इस कदम से उनके अनुयायी पूरे देश में दलित वर्गों के लिए आतंक की स्थिति पैदा कर सकते हैं।
इस प्रकार के बल प्रयोग से दलित वर्गों को हिन्दू वर्ग में शामिल नहीं किया जा सकता, यदि वे बाहर रहने के लिए कृतसंकल्प हैं। यदि महात्मा दलित वर्गों से यह पूछते हैं कि वे हिन्दू धर्म और राजनीतिक अधिकारों में से किसे पसंद करते हैं तो मुझे पूरा विश्वास है कि दलित वर्ग राजनीतिक अधिकारों को चुनेंगे तथा महात्मा को आत्मदाह से बचा लेंगे। यदि श्री गांधी अपने इस कृत्य पर ठंडे मन से सोचेंगे तो मुझे पूरा-पूरा विश्वास है कि उन्हें अपनी विजय उपयुक्त लगेगी। इस ओर भी ध्यान देना अधिक महत्वपूर्ण है कि महात्मा प्रतिक्रियावादी तथा अनियंत्रणीय प्रचंड