खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 162

145

भावनाओं को व्यक्त कर रहे हैं और इस कदम का सहारा लेकर हिन्दू समुदाय तथा दलित वर्गों के बीच नफरत की भावना को प्रोत्साहित कर रहे हैं जिसके परिणामस्वरूप इन दोनों के बीच की मौजूदा खाई और चौड़ी हो रही है। जब मैंने गोल मेज सम्मेलन में गाँधी का विरोध किया था तब देश में मेरे खिलाफ काफी हो-हल्ला मचा था और तथाकथित राष्ट्रवादी प्रेस में यह षडयंत्र रचा जा रहा था कि मुझे राष्ट्रीय मुद्दों के एक गद्दार के रूप में पेश किया जाए, मेरी ओर से किए जाने वाले पत्राचार को रोका जाए, और बैठकों तथा सम्मेलनों के बारे में समाचारों को बढ़ा-चढ़ा कर प्रकाशित करके मेरे दल के विरुद्ध प्रचार को बढ़वा दिया जाए। इन बैठकों तथा सम्मेलनों में से कुछ तो कभी आयोजित ही नहीं हुए थे। दलित वर्गों की सभी श्रेणियों में दरार पैदा करने के लिए ‘‘सिलवर बुलेट्स’’ का खुल कर प्रयोग किया गया था। कुछ मुठभेड़ भी हुईं जिनका अंत हिंसा में हुआ।

यदि महात्मा यह नहीं चाहते हैं कि इस सबकी बड़े पैमाने पर पुनरावृत्ति हो तो भगवान के लिए उन्हें अपने निर्णय पर फिर से विचार करना चाहिए ताकि महाविपदा के परिणामों से बचा जा सके। मुझे विश्वास है कि महात्मा भी ऐसा नहीं चाहेंगे। यदि अपनी कामना के बावजूद वे बाज नहीं आते तो जिस प्रकार दिन के बाद रात आती है उसी प्रकार ये परिणाम अवश्यमभावी हैं।

इस बयान को समाप्त करने से पहले, मैं जनता को यह आश्वस्त करने की इच्छा रखता हूं कि जब मैं यह कहने का पात्र हूं कि मैं इस मामले को अब समाप्त समझता हूं और मैं महात्मा के प्रस्तावों पर विचार करने को तैयार हूं। तो मुझे यह विश्वास है कि महात्मा मुझे अपने जीवन और मेरे लोगों के अधिकारों में से एक को चुनने के लिए विवश नहीं करेंगे। ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि मैं आने वाली कई पुश्तों तथा सवर्ण हिन्दुओं के समक्ष अपने हाथ पैर-बांध कर अपने लोगों को कुछ देने की स्वीकृति नहीं दे सकता।’’ ख्1,

श्री गांधी द्वारा आमरण अनशन की घोषणा से लोगों को अछूतों की हालत के बारे में और अधिक जानने को मिलेगा और अछूतों के मन में उत्पन्न हो रहे भावों के बारे में कुछ देर के लिए तो उनकी आंखे खुलेंगी। लोगों, प्रेस और देशभक्तों को यह अहसास दिलाया गया कि वे उनके समाज पर एक धब्बा है। प्रत्येक राजनीतिक दल में, प्रत्येक सामाजिक दायरे में और प्रत्येक धार्मिक संस्था में डॉ. अम्बेडकर के बारे में अंतहीन चर्चा चल रही है। उन्हें ढेरों तार तथा पत्र मिल रहे हैं, कुछ उन्हें जान की धमकी दे रहे हैं, कुछ उनके अंतःकरण से अनुरोध कर रहे हैं और कुछ उनके रुख का समर्थन कर रहे हैं।

  1. जनता, दिनांक 24 सितम्बर, 1932 ।