146 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
घोषणानुसार, हिन्दू नेताओं का सम्मेलन 19 सितम्बर, 1932 को विशाल हॉल ऑफ दि इंडियन मर्चेन्ट्स चैम्बर में तनावपूर्ण वातावरण में आयोजित हुआ था। इसकी अध्यक्षता पंडित मदन मोहन मालवीय ने की। डॉ. अम्बेडकर और डा. सोलंकी अध्यक्ष की कुर्सी के पास ही बैठे थे। राजा और डॉ. मुंजे ने हाथ में हाथ डाले हाल में प्रवेश किया।’’ ख्1,
उपस्थित लोगों में शामिल थे : राजेन्द्र प्रसाद, सी. राजगोपालाचारी, पंडित कुंजरू, टी. प्रकाशम, डॉ. चौथीराम, स्वामी सखानंद, श्री एनेय, जी. ए. गवई, श्री शिवराज, श्री जगन्नाथन, श्री धर्मलिंगम, श्री मंडल, सर चुन्नीलाल, हीराचंद, बालचंद, सर सीतलवाड़, सर मडगांवकर, सर पुरुषोत्तमदास, श्री देवधर, श्री नटराजन, राव बहादुर वैद्य, डॉ. देशमुख, दालवी, सूबेदार, सपू सेठ बिड़ला, श्री करंदीकर, डॉ. सावरकर, शिवतारकर, पी. बालू, निकलजे, कमला नेहरू, पेरानी कैप्टन, मोशेन कैप्टन, साऊ, अवन्तिकाबाई गोखले, श्रीमती अन्नपूर्णाबाई देशमुख, रत्नाबेन मेहता, कुमारी नटराजन।
महात्मा गाँधी का जीवन बचाने के लिए, बैठक के अध्यक्ष पंडित मदन मोहन मालवीय ने सुझाव दिया कि एक ऐसे हल की तलाश की जाए जो दोनों पक्षों को स्वीकार्य हो।
पंडित मालवीय के अनुरोध पर, डॉ. बी. आर. अम्बेडकर बोलने के लिए खड़े हुए। उन्होंने निष्कपट भाव से अपने विचार रखे। उन्होंने कहा,
सम्मेलन के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए, मुझे नहीं लगता कि ऐसे किसी सम्मेलन का आयोजन करने की कोई आवश्यकता है। हमारी मांगों का विरोध करने के लिए, महात्मा गांधी ने आमरण अनशन प्रारंभ किया है। यह स्वाभाविक ही है कि हर कोई महात्मा गांधी के मूल्यवान जीवन को बचाना चाहेगा। लेकिन अपने जीवन को दांव पर लगाने से पहले, गाँधी जी को कुछ ठोस वैकल्पिक प्रस्ताव प्रस्तुत करने चाहिए थे। मौजूदा परिस्थिति पर विचार करने के बाद, मैं यह महसूस करता हूं कि महात्मा गाँधी से कोई स्पष्ट वैकल्पिक प्रस्ताव मिले बिना बातचीत के सभी प्रयास विफल रहेंगे। निस्संकोच, निर्णय लेने के लिए कुछ बचा ही नहीं है। जब तक हमें यह पता नहीं चल जाता कि वास्तव में गँंधी जी के मन में क्या है तब तक इस सम्मेलन में पुनरावृत्त विचार- विमर्श से कोई परिणाम निकलने वाले नहीं हैं। इस सम्मेलन में कितनी भी लंबी चर्चा क्यों न कर ली जाए मुझे तब तक कोई हल नहीं मिल सकता जब तक कि मुझे यह पता नहीं चल जाता कि गाँधी जी के मन में क्या है, और मैं आपको साफ-साफ शब्दों में यह कहना चाहूंगा कि इस सम्मेलन के संयोजकों या अन्य नेताओं से मिलने वाले प्रस्तावों से मैं कदापि बंधा हुआ नहीं
- कीर, पृष्ठ 208 ।