खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 164

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हूँ, मैं केवल महात्मा गाँधी की राय पर विचार करूंगा। जब तक मुझे उनके प्रस्ताव के बारे में पता नहीं चलता, मैं अपनी राय कैसे दे सकता हूं। पहले उनसे प्रस्ताव लाओ फिर मैं उस पर विचार करूंगा। यहां मैं प्रारंभ में ही यह स्पष्ट कर दूँ कि गाँधी जी का कोई भी प्रस्ताव आपमें से सवर्ण हिन्दू प्रतिनिधि ही मेरे पास लेकर आए और मैं ऐसे किसी भी प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करूंगा जो गँंधी जी की ओर से अछूत नेता लेकर आएगा। महात्मा गांधी के जीवन को बचाने के लिए मैं अपने लोगों की न्यायसंगत मांगों की बलि नहीं दूंगा।’’ ख्1, इसके बाद यह सम्मेलन दिन भर के लिए स्थगित हो गया।

‘‘सोमवार, 20 सितम्बर, 1932 को दोपहर 12 बजे महात्मा गाँधी ने आमरण अनशन प्रारंभ किया। इस मामले में बातचीत करने के लिए एक समिति का गठन किया गया था। इस समिति में सर तेज बहादुर सप्रू, बैरिस्टर जयकर, पंडित मदन मोहन मालवीय, मथुरादास वासनजी सवर्ण हिन्दू के प्रतिनिधियों के रूप में शामिल थे। डॉ. बी. आर. अम्बेडकर को इस बैठक के लिए आमंत्रित किया गया था। इस सम्मेलन में महात्मा गाँधी की ओर से सर चुन्नीलाल ने निम्नलिखित विचार समिति के सदस्यों के समक्ष प्रस्तुत किए।

वे इस प्रकार थे :-

  1. महात्मा गाँधी ने अछूतों के लिए पृथक निर्वाचकमंडल प्रणाली के फैसले का

विरोध किया।

  1. वे संयुक्त निर्वाचकमंडल के लिए आरक्षित सीटों के लिए भी पूरी तरह से

सहमत नहीं थे। तथापि, मुंंबई में यदि अखिल हिन्दू सम्मेलन आरक्षित सीटों

के लिए कोई विशिष्ट निर्णय लेता है तो वे इस पर आपत्ति नहीं उठाएंगे,

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होगा कि यह आवश्यक ही हो कि वे उससे

सहमत हों। यदि किसी तरह किसी तथ्य पर कोई सहमति बनती है तो वे

संभवतः अपनी स्वीकृति दे दें।

महात्मा गाँधी के प्रस्ताव सुनने के बाद डा. अम्बेडकर बोलने के लिए खड़े हुए। उनका भाषण वास्तव में ही बहुत दमदार था और दिल को छूने वाला था। उन्होंने कहाः

‘‘मैं आज इस कठिन परिस्थिति में बातचीत करते हुए अन्य की तुलना में स्वयं को अधिक अपरिचित स्थिति में महसूस कर रहा हूँ। दुर्भाग्यवश, इस शांतिपूर्ण बातचीत के दौरान अपने लोगों की न्यायोचित मांगों का संरक्षण करते हुए मुझे ऐसा लग रहा है कि

  1. जनता, दिनांक 24 सितम्बर, 1932।