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‘‘नेताओं ने उनका सुझाव मान लिया और जयकर, सप्रू, बिड़ला, राजागोपालाचारी और डॉ. राजेन्द्र प्रसाद मंगलवार को अर्द्धरात्रि की रेलगाड़ी से पूना के लिए रवाना हो गए।
21 सितम्बर की दोपहर में गांधी को चेरावाड़ा जेल के प्रवेश द्वार के बिल्कुल नजदीक आंगन में ले जाया गया और सरदार पटेल एवं गांधी के सचिव प्यारेलाल को उनकी चारपाई के पास बैठने की अनुमति मिल गई। दोपहर में सप्रू ने पूना से डॉ. अम्बेडकर को फोन किया और उनसे तत्काल पूना आने को कहा।’’ ख्1,
बुधवार 21 सितम्बर, 1932 को पूना के लिए रवाना होने से पहले टाइम्स ऑफ इंडिया को एक साक्षात्कार में डॉ. अम्बेडकर ने कहा, ‘‘मुझे पूना से यह संदेश मिला है कि सम्मेलन द्वारा नियुक्त समिति को गत रात्रि मेरे द्वारा प्रस्तुत किए गए प्रस्ताव के बारे में श्री गांधी मुझसे और श्री राजा से मिलना चाहते हैं।’’
‘‘मैंने निमंत्रण स्वीकार कर लिया है लेकिन मैंने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि मुझे श्री राजा और उनके दल के साथ बातचीत से कोई सरोकार नहीं है, और अगर श्री गाँधी को उनसे बातचीत करनी है तो वे अलग से कर सकते हैं। ऐसा कहने का कारण यह था कि वास्तव में यह विवाद एक ओर मेरे और मेरे दल, तथा दूसरी ओर, श्री गांधी के बीच में है।’’
‘‘मैं कांग्रेस तथा हिन्दू महासभा की इस नीति को कड़े शब्दों में अस्वीकार करता हूं कि वे अपने स्वयं के प्रयोजनों के लिए तथा अपने प्रचार द्वारा दलित वर्गों के नेताओं का सृजन करें और फिर उन्हें दलित वर्गों पर थोपने का प्रयास करें। इसमें श्री राजा ने स्वयं के विरुद्ध कुछ भी नहीं कहा। मैं आज रात प्रस्थान कर रहा हूँ।’’
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सर तेज बहादुर सप्रू और श्री जयकर रेलगाड़ी से पूना पहुंचे और बुधवार 7.30 बजे जेल में श्री गाँधी से मिले और प्रातः 10 बजे के बाद तक सम्मेलन में उनके साथ ही रहे थे। प्रस्थान करते समय उन्होंने कहा कि वे कल सुबह संभवतः लौट आएंगे।
साक्षात्कार के बाद जारी बयान में कहा गया :-
सर तेज बहादुर सप्रू, श्री जयकर, श्री राजागोपालाचारी, बाबू राजेन्द्र प्रसाद और श्री जी.डी. बिड़ला के एक प्रतिनिधिमंडल ने आज सुबह लंबे समय तक श्री गांधी से
- कीर, पृष्ठ 2010 ।