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भी आ गए जिन्होंने गाँधी से यह वायदा किया कि वे एक ऐसा समझौता करा लेंगे जिससे वे (गांधी) संतुष्ट हो जाएंगे।
देर शाम डॉ. अम्बेडकर और उनके साथ जयकर, बिड़ला, चुन्नीलाल मेहता तथा राजगोपालाचारी जेल में गांधी जी से मिलने गए। यह सबसे गंभीर राजनीतिक संकट था। जब इन लोगों ने कारागार प्रांगण में प्रवेश किया तब गाँधी आम के पेड़ के नीचे की घनी छांव में लोहे की एक सफेद चारपाई पर लेटे हुए थे जिस पर जेल का गद्दा बिछा हुआ था, और सरदार पटेल तथा सरोजिनी नायडू गांधी के पास बैठे थे। चारपाई के नजदीक पानी की बोतलें, सोडाबाइकार्ब और नमक रखा हुआ था।
जब डॉ. अम्बेडकर चारपाई के पास पहुंचे तब वहां प्रतिध्वनि रहित शांति और स्तब्ध व्यग्रता पसरी हुई थी। क्या उलझन भरी यह शांति डॉ. अम्बेडकर को विचलित कर पाएगी? जयकर ने तो पहले ही बता दिया था कि गाँधी को देखते ही डाँ. अम्बेडकर की कट्टरता खंडित हो जाएगी। वातावरण की सम्मोहक उदासी जिसे सांझ का प्रकाश और गहरा रहा था क्या डॉ. अम्बेडकर को बहका सकेगी? डॉ. अम्बेडकर अब गाँधी के आवृत व्यक्तित्व के समक्ष थे जिन्होंने शक्तिशाली लोगों को अपने वशीभूत कर लिया था और अपने चुम्बकीय रहस्यवाद के सैलाब में बहा दिया था। जेल के बाहर भयंकर चक्रवात और अंदर उलझन भरी शांति के बीच डा. अम्बेडकर शांत तथा प्रकृतिस्थ थे। कोई लघु व्यक्ति घटनाओं के इस चक्रवात में जिंदा दफन हो जाता। डॉ. अम्बेडकर को अपने जीवन से अधिक अपने लोगों से प्यार था और वे अपनी खुशी से अधिक उनकी खुशी के बारे में चिंतित रहते थे।
गांधी दुर्बल थे। वे अपने बिस्तर पर लेटे हुए थे। बातचीत शुरू हुई। सपू्र ने गाँधी को पूरी बात बताई। मालवीय ने हिन्दुओं का दृष्टिकोण बताया। इसके बाद नम्र, धीमें प्रवाह में डॉ. अम्बेडकर ने बोलना शुरू किया। उन्होंने धीमी आवाज में कहा।’’ ख्1,
‘‘महात्माजी, आप हमारे प्रति बहुत अनुचित रहे हैं। लगता है हमेशा मेरा भाग्य ही प्रतिकूल रहा है,’’ गाँधी ने उत्तर दिया, ‘‘मैं इसमें कुछ नहीं कर सकता।’’
बैठक लंबे समय तक चली और अधिकतर डॉ. अम्बेडकर ही बोलते रहे, जबकि गाँधी दुर्बल नजर आ रहे थे तथा अभी तक बिस्तर पर ही थे। डॉ. अम्बेडकर ने बार-बार आग्रह किया, ‘‘मुझे अपना मुआवजा चाहिए।’’गाँधी ने आश्वासन दिया, ‘‘जो कुछ भी आप कह रहे हैं, उसमें से अधिकांश से मैं सहमत हूं, लेकिन आप कहते हैं कि आपकी रुचि मेरे जीवन में है।’’
- कीर, पृष्ठ 210-212 ।