खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 172

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‘‘डॉ. अम्बेडकर ने गाँधी का सुझाव मान लिया। बातचीत समाप्त हो गई और नेतागण नामावली में व्यक्तियों की संख्या, प्रांतीय विधायिकाओं में सीटों की कुल संख्या, प्राथमिक प्रणाली की अवधि, आरक्षित सीटों की अवधि और पदों के वितरण के बारे में समझौता करने में व्यस्त हो गए।’’ ख्1, (एपिक फास्ट, पृष्ठ 209-210)।

जब डॉ. अम्बेडकर और डॉ. सोलंकी गाँधी से मिले तब पूना में उपस्थित अधिकांश नेता उनके साथ थे।

शुक्रवार 23 सितम्बर की सुबह हो गई थी। घंटों तक नामावली के लिए अपेक्षित उम्मीदवारों की संख्या को लेकर गर्मागर्म बहस चलती रही। फिर सीटों का मुद्दा था। डॉ. अम्बेडकर ने प्रांतीय विधायिकाओं में 197 सीटें मांगी तथा नेताओं ने इस संख्या को घटाकर 126 कर दिया। बातचीत खिंचती रही। घंटों बीत गए। दस घंटों के विचार-विमर्श के बाद, कुछ बिन्दुओं पर गांधी की राय मांगी गई तथा उन्होंने डॉ. अम्बेडकर के बिन्दु को सही ठहराया। लेकिन अभी भी प्राथमिक चुनाव की अवधि और आरक्षित सीटों की अवधि के बारे में निर्णय लेने के लिए जनमत संग्रह के प्रश्न पर बातचीत टूटती नजर आ रही थी। डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि प्राथमिक चुनाव की प्रणाली दस वर्ष पूरे होने पर समाप्त हो जानी चाहिए, लेकिन उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अगले पन्द्रह वर्ष समाप्त होने पर दलित वर्गों के जनमत संग्रह द्वारा आरक्षित सीटों के प्रश्न को हल किया जाना चाहिए। नेताओं की राय थी कि आरक्षित सीटें और पृथक्करण की बुराई निरंतर चलती रहेगी यदि इसे दूर करने का दायित्व दलित वर्गों का होगा। डॉ. अम्बेडकर द्वारा पच्चीस वर्षों की समाप्ति पर जनमत संग्रह की मांग पर जोर देने से सवर्ण हिन्दुओं में उमंग की लहर उठ रही थी। डॉ. अम्बेडकर ने उन्हें साफ-साफ शब्दों में कहा कि वे इस बात पर विश्वास करने से इंकार करते हैं कि अगले पच्चीस या कुछ अधिक वर्षों में कोई अछूत नहीं बचेगा, और इसीलिए उन्होंने कहा कि कठिन परिस्थिति का सामना करने पर सवर्ण हिन्दुओं को अछूतों के प्रति अपने अमानवीय व्यवहार को बदलने के लिए बाध्य होना पड़ेगा।’’ ख्2,

‘‘....................डाँ. अम्बेडकर ने गाँधी से इच्छा व्यक्त की कि दस वर्ष बाद के जनमत संग्रह के लिए सहमत हो जाएं। गाँधी का रवैया कुछ बेहतर था और वे बहुत धीरे बोले लेकिन सोच-समझ कर। उन्होंने कहा, ‘‘आपके तर्क का कोई तोड़ नहीं है। लेकिन जनमत संग्रह पांच वर्ष के बाद हो। निश्चय ही, जाति हिन्दुओं को अपना सदाशय सिद्ध करने के लिए पांच वर्ष का समय पर्याप्त है। लेकिन अगर जनमत संग्रह को आगे स्थगित करने पर अडिग रहते हैं तो मुझे यह संदेह होने लगेगा कि 1.2. कीर, पृष्ठ 212 ।कीर, पृष्ठ 212-213 ।