खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 173

156 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

आप सवर्ण हिन्दुओं के सदाशय की जांच नहीं करना चाहते बल्कि एक प्रतिकूल जनमत संग्रह कराने के लिए दलित वर्गों को संगठित करने हेतु समय चाहते हैं।’’ उन्होंने परस्पर आस्था, विश्वास और सद्भाव बनाए रखने के लिए पुरजोर अनुरोध किया। उन्होंने बताया कि बारह वर्ष की आयु से कैसे अपना सब कुछ किसी इंसान को अछूत मानने के विचार मात्र का विरोध करने के लिए दांव पर लगा दिया और तब से कैसे वे इस बुराई के विरुद्ध एक अंतहीन धर्मयुद्ध का नेतृत्व कर रहे हैं। उन्होंने डॉ. अम्बेडकर से कहा कि ‘‘आपको पूरा-पूरा अधिकार है कि सांविधिक उपायों के अंतर्गत शत-प्रतिशत सुरक्षा की मांग करें। लेकिन मैं अपने प्रबल वेग से आपसे यह प्रार्थना करता हूं कि अपने अधिकार पर जोर न दें। आज मैं सवर्ण हिन्दू भाईयों को कुछ राहत दिलाने के लिए निवेदन करने आया हूं। भगवान का शुक्र है कि उनका अंतःकरण जाग गया है। यदि आप सांविधिक उपायों के अंतर्गत उनसे शत-प्रतिशत सुरक्षा छीनने के लिए कदम बढ़ाएंगे तो उनमें तीव्र गति से हो रहे हृदय परिमार्जन और स्व-शुद्धिकरण की प्रक्रिया में रुकावट आ जाएगी। अछूतों के प्रति होने वाले किसी अन्याय विशेष को कुछ समय के लिए रोक लिया जाएगा, लेकिन हिन्दूवाद में हमेशा के लिए विकृति आ जाएगी। आखिरकार, छूआछूत गहरे पैंठी विकृति का ही एक लक्षण है। यदि हिन्दूवाद को इससे पूरी तरह से मुक्त नहीं किया गया तो यह विभिन्न रूपों में बार-बार उभरता रहेगा और हमारे समूचे सामाजिक एवं राजनीतिक ढांचे को विषाक्त करता रहेगा। अतः मैं आपसे अनुनय विनय करता हूं कि हिन्दूवाद को अपने पापयुक्त भूत का स्वेच्छा से प्रायश्चित करने के अंतिम अवसर से वंचित न करें। मुझे सवर्ण हिन्दुओं के बीच काम करने का एक मौका दो। यह उचित ही रहेगा। यदि आप दस या पन्द्रह सालों की बात करोगे तो यह अवसर कभी नहीं आएगा। पांच सालों के भीतर हिन्दुओं को अच्छा चरित्र प्रस्तुत करना होगा, अन्यथा कभी नहीं। अतः मेरे लिए जनमत संग्रह के लिए पांच वर्ष की सीमा निरपेक्ष रूप से अंतःकरण का मामला है। जनमत संग्रह होना चाहिए, लेकिन पांच वर्ष से अधिक लंबी अवधि के बाद नहीं। अपने मित्रों से कह दो कि मैं इस बात पर अड़ा हुआ हूं। मैं एक घृणित व्यक्ति हो सकता हूं, लेकिन जब मेरे अंदर का सच बोलता है तब मैं अजेय हूं।’’ (एपिक फास्ट, पृष्ठ 211-212)’’ ख्1,

‘‘बातचीत खत्म हो गई, नेता नामावली में व्यक्तियों की संख्या, प्रांतीय विधायिकाओं में कुल सीटों की संख्या, प्राथमिक प्रणाली की अवधि, आरक्षित सीटों की अवधि और पदों के वितरण के बारे में समझौता करने में व्यस्त हो गए।’’ यह बैठक राजा बहादुर शिवलाल मोतीलाल के घर पर हुई थी।’’

  1. पुनः मुद्रित, खैरमोर, खंड 5, पृष्ठ 47-48