खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 174

157

‘‘अब शाम के चार बज गए थे। यह समाचार मिला कि गांधी का स्वास्थ्य चिन्ताजनक हो रहा है और वे तेजी से अपनी क्षमता खोते जा रहे हैं। गांधी के पुत्र देवदास गांधी ने आंखों में आंसू लेकर डॉ. अम्बेडकर के समक्ष अपने पिता की हालत का बयान किया और यह अनुनय-विनय की कि जनमत संग्रह पर बल देते हुए समझौते को टालें नहीं। अंततः इस मामले को गांधी को भेजने का निर्णय लिया गया। अम्बेडकर कुछ चुनिंदा नेताओं के साथ रात नौ बजे जेल में गाँधी से मिले। गांधी ने जनमत संग्रह के विचार को अपना अनुमोदन प्रदान कर दिया, लेकिन कहा कि यह पांच वर्ष के बाद होना चाहिए। गांधी की आवाज अब फुसफुसाहट में बदल गई थी। जेल के डाक्टर ने हस्तक्षेप किया और आगे बातचीत बंद कर दी। आम के पेड़ के पत्तों ने अब हिलने से इंकार कर दिया था। एक स्तब्ध शांति थी। आगंतुकों को वापिस लौटना था। डॉ. अम्बेडकर अपना मुद्दा छोड़ने को तैयार नहीं थे। उनकी इच्छाशक्ति पर दबाव था। उन्हें जान से मारने की धमकी से भरे पत्रों की वर्षा हो रही थी।’’ ख्1,

इनमें से एक पत्र है :

‘‘डॉ. अम्बेडकर

अगर आप महात्मा गांधी की मांग चार दिन में नहीं मानते हो तो आपकी जान को खतरा है। अगर आपको अपना जीवन बचाना है तो आपको गांधी जी की मांग मान कर गांधी जी को तत्काल अपना अनशन खत्म करने में मदद करनी चाहिए। यह आपको एक चेतावनी है। अगर आपने अपनी उग्रता का त्याग नहीं किया तो आपको मार डालेंगे।’’

ह./-

हरिभाई के. भट्ट

बीपीईई का एक सदस्य एवं कार्यकर्त्ता’’ ख्2,

‘‘गली में उन्हें हिंसक निगाहों से देख रहे थे, और कुछ नेतागण उनके पीछे उन्माद में उनकी निंदा कर रहे थे।’’

इसके अलावा, जनता (24.9.1932, पृष्ठ 8) ने पूना के स्पृश्य वर्गों के कुछ युवाओं द्वारा डा. अम्बेडकर को जान से मारने की एक योजना छापी थी, जो इस प्रकार थी :

1.2. कीर, पृष्ठ 213 ।जनता, दिनांक 1 अक्तूबर, 1932 ।