164 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
हिन्दुओं के कंधों पर है कि वे इसे अमल में लाएं।
सर तेज बहादुर सप्रू, राजगोपालाचारी भी इस अवसर पर बोले। श्री मथुरा दास, विसनजी खिमजी ने संकल्प प्रस्तुत किया। श्री मथुरा दास, बिसनजी खिमजी ने पूना समझौते की पुष्टि करने के संकल्प को प्रस्तुत किया।’’ ख्1,
इस बैठक में निम्नलिखित संकल्प पारित किया गया :
‘‘यह सम्मेलन 24 सितम्बर, 1932 को सवर्ण हिन्दुओं और दलित वर्गों के नेताओं के बीच हुए पूना समझौते की पुष्टि करता है और यह विश्वास व्यक्त करता है कि ब्रिटिश सरकार हिन्दू समुदाय के लिए अलग निर्वाचकमंडल की प्रणाली का सृजन करने के अपने निर्णय को वापिस ले लेगी तथा इस समझौते को पूर्णरूपेण स्वीकार करेगी। सम्मेलन यह आग्रह करता है कि सरकार तत्काल कार्रवाई करे ताकि महात्मा गांधी अपनी शपथ की शर्तों के अनुसार और बहुत देर होने से पहले अपना अनशन समाप्त कर दें। यह सम्मेलन संबंधित समुदायों के नेताओं से यह अनुरोध करता है कि वे इस समझौते तथा इस संकल्प के आशय को समझें और उसे पूरा करने के लिए ईमानदारी से प्रयास करें।’’
‘‘यह सम्मेलन संकल्प करता है कि अब से हिन्दुओं में जन्म के कारण कोई भी अछूत नहीं समझा जाएगा, और यह कि जिन्हें अब तक अछूत समझा जाता रहा है उन्हें सार्वजनिक कुंओं, सार्वजनिक स्कूलों, सार्वजनिक सड़कों और अन्य सभी सार्वजनिक संस्थाओं के प्रयोग के बारे में अन्य हिन्दुओं की भांति ही अधिकार प्राप्त होंगे। यदि इसे उस समय से पहले ऐसी पहचान प्राप्त नहीं होती है तो पहले अवसर में ही इस अधिकार को सांविधिक मान्यता प्राप्त होगी और यह स्वराज संसद के सबसे पहले अधिनियमों में से एक होगा।’’
‘‘यह भी सहमति हुई कि सभी हिन्दू नेताओं का यह कर्त्तव्य होगा कि प्रत्येक न्यायसंगत या शांतिपूर्ण प्रयास तथाकथित अछूत वर्गों पर प्रथा द्वारा अब तक सभी सामाजिक निर्योग्यताओं, जिनमें मंदिरों में प्रवेश पर रोक शामिल है, को शीघ्र दूर किया जाए।’’ ख्2,
डॉ. सप्रू ने कहा कि ‘‘डॉ. अम्बेडकर जिस उद्देश्य का प्रतिनिधित्व करते हैं उसके लिए लड़े तथा बहादुरी से लड़े और उन्होंने देश के भविष्य के लिए एक अच्छे योद्धा की भूमिका का निर्वाह करने का वचन दिया है।’’
1.2. दि बंबई क्रानिकल, दिनांक 26 सितम्बर, 1932।लेख तथा भाषण, खंड 9, पृष्ठ 103 ।