170 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
शाम को जेल के प्रांगण में प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया। कस्तूरबा
ने गांधी को संतरे का रस दिया और उन्होंने लगभग साढ़े पांच बजे लगभग दो
सौ शिष्यों तथ प्रशंसकों, कवि टैगोर, सरोजिनी नायडू तथा स्वरूप रानी नेहरू की
उपस्थिति में अपना अनशन तोड़ा।’’ ख्1,
इस बारे में डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने कहा,
‘‘इस कहानी की सच्चाई सजीव तथा भड़कीले शीर्षक ‘‘दि एपिक फास्ट’’ द्वारा श्री
प्यारेलाल द्वारा लिखी गई पुस्तक में बताई गई है। जिज्ञासु व्यक्ति इसका हवाला
दे सकते हैं लेकिन मैं उन्हें सचेत करना चाहूंगा कि इसे एक ‘‘बॉसवेल’’ ने लिखा
है और इसमें ‘‘बासवेलिआना’’ के सभी दोष निहित हैं। इसका एक और पक्ष भी है,
लेकिन उसके बारे मेंं यहां चर्चा करने का न तो समय है और न ही स्थान। मैं बस
उस बयान [2] की ओर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहूंगा जिसे मैंने श्री गांधी द्वारा
अनशन प्रारंभ करने से पहले उनकी युक्तियों की पोल खोलने के लिए जारी किया
था। यहां यह कहना काफी होगा कि श्री गांधी ने आमरण अनशन की घोषणा तो
कर दी थी, लेकिन वे मरना नहीं चाहते थे। वे बिल्कुल जीना चाहते थे।’’
‘‘फिर भी अनशन ने एक समस्या यह खड़ी कर दी थी कि श्री गांधी की जान
कैसे बचाई जाए। उनकी जान बचाने का यही तरीका था कि साम्प्रदायिक अधिनिर्णय
में परिवर्तन किया जाए जिसके बारे में श्री गाँधी ने कहा कि वह उनके अंतःकरण को
बहुत चोट पहुंचाता है। प्रधान मंत्री ने यह बिल्कुल स्पष्ट कर दिया था कि ब्रिटिश
मंत्रिमंडल न तो इसे वापिस लेगा और न ही इसमें अपनी ओर से कोई परिवर्तन
करेगा, लेकिन वे इसके स्थान पर एक ऐसे फार्मूले को रखने के लिए तैयार हैं जिस
पर सवर्ण हिन्दू तथा अछूत सहमत हों। चूंकि मुझे गोल मेज सम्मेलन में अछूतों का
प्रतिनिधित्व करने का विशेषाधिकार मिला था, यह मान लिया गया था कि अछूतों की
सहमति तब तक वैध नहीं होगी जब तक मुझे इसका एक पक्षकार नहीं बना लिया
जाता। आश्चर्यजनक सच्चाई यह है कि भारत के दलितों के एक नेता के रूप में
मेरी हैसियत पर कांग्रेसजनों ने केवल सवाल उठाए बल्कि इसे एक सच्चाई के रूप
में मान भी लिया था। निस्संदेह सभी निगाहें मेरी ओर थीं जो मुझे उस क्षण के एक
व्यक्ति के रूप में या फिर कार्य के एक खलनायक के रूप में देख रही थीं।’’
- 2 कीर, पृष्ठ 215।इस भाग का पृष्ठ 143ः150 देखिए - सम्पादकगण।