खण्ड - IV कालाराम मन्दिर प्रवेश सत्याग्रह, नासिक और मन्दिर प्रवेश आन्दोलन - Page 193

176 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

चल रही थी। जैसे ही वह जुलूस मंदिर के पूर्वी द्वार तक पहुंचा, जिला मजिस्ट्रेट, पुलिस सुपरिन्टेंडेट और सिटी मजिस्ट्रेट मंदिर के द्वार पर पहुँच गए। मंदिर के सभी द्वार बंद थे, इसलिए आंदोलनकारी गोदावरी घाट की तरफ बढ़ गए। वहाँ यह जुलूस एक सभा में रूपांतरित हो गया।

उस रात ग्यारह बजे नेताओं ने पुनः सभी पहलुओं पर चर्चा की और मंदिर के द्वारों के आगे अहिंसक संघर्ष शुरू करने का फैसला किया। इस तरह यह ऐतिहा­ सिक संघर्ष 3 मार्च, 1930 की सुबह शुरू हुआ। 125 पुरूषों और 25 महिलाओं का पहला दल मंदिर के चारों द्वारों पर तैनात किया गया तथा 8,000 से अधिक सूचीबद्ध सत्याग्रही अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे। परन्तु मंदिर के द्वार बंद और अवरुद्ध थे। सत्याग्रही प्रवेश द्वार पर बैठकर स्तोत्र और भजन गाते रहे। 3,000 से अधिक संख्या में अछूतों की भीड़ उनके आसपास एकत्र हो गई, लेकिन पुलिस सतर्क थी तथा उन्हें रोक रखा था। प्रत्येक द्वार पर सशस्त्र पुलिस बल तैनात थे। किसी भी आपात स्थिति का सामना करने के लिए सुबह सवेरे से ही वहाँं प्रथम श्रेणी के दो मजिस्ट्रेट तैनात थे। पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट रेनाल्ड्स ने मंदिर के ठीक सामने टेंट में ही अपना कार्यालय बना लिया था।

मंदिर में स्पृश्यों का प्रवेश भी बाधित हो गया था क्यांकि द्वार बंद थे और उनके नेता गतिरोध से बाहर निकलने के रास्ते तलाशने के लिए बंद दरवाजों के पीछे विचार-विमर्श कर रहे थे। यदि सवर्ण हिन्दुओं के लिए दरवाज़े खोल दिए जाते तो स्थिति बहुत जटिल हो जाती।

रात को शंकराचार्य डॉ. कुर्ताकोटी की अध्यक्षता में नासिक के नागरिकों की जनसभा हुई लेकिन रूढि़वादी लोगों की प्रबलता के कारण यह सभा उपद्रव में समाप्त हो गई। अब तक सनातनी संत्रस्त और उपद्रवी हो चुके थे। उन्होंने सभा पर पत्थर और जूते फेंके। यह महसूस किया गया कि यदि खुद राम भी रूढि़वादी हिंदुओं से अछूतों के लिए मंदिर के दरवाजे खोलने के लिए कहते तो उन्हें भी दरकिनार कर दिया जाता।

सत्याग्रह संघर्ष करीब एक महीने तक जारी रहा। 9 अप्रैल आ गई। इस दिन रथ पर राम की प्रतिमा रखकर जुलूस निकाला जाता है। जातिवादी हिन्दुओं और अछूतों के बीच एक समझौता हुआ। यह फैसला हुआ कि दोनों पक्षों के ताकतवर लोग रथ खींचेंगे। वह दृश्य देखने के लिए मंदिर के मुख्य द्वार के निकट दोपहर को हजारों लोग जमा हो गए। डॉ. अम्बेडकर अपनी पसंद के पहलवानों के साथ द्वार के समीप खड़े थे। लेकिन इससे पहले कि वे रथ को स्पर्श कर पाते, सवर्ण