180 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
दंगे की शुरुआत :- कलाराम मंदिर, नासिक में प्रचलन के अनुसार पूरे शहर में भगवान राम की रथ-यात्रा निकाली जानी थी। इंस्पेक्टर कार्णिक (कलाराम मंदिर में तैनात एक पुलिस अधिकारी) ने मुझसे पूछा कि रथ-यात्रा के संबंध में मैं क्या रवैया अपनाने वाला हूॅं। मैंने कहा कि यदि अस्पृश्यों के साथ समानता का व्यवहार किया जाता है, तो मुझे यात्रा के लिये रथ निकाले जाने पर कोई आपत्ति नहीं है और मैंने उन्हें समानता के व्यवहार की प्रकृति भी स्पष्ट की। मैंने यह निश्चित करने की अपेक्षा की थी कि मैं दो बातों पर दृढ़ रहूँगा-
(1) कि अस्पृश्य भी रथ खींचने में स्पृश्यों के साथ हिस्सा लेंगे और (2) अस्पृश्य रथ में मूर्ति की पूजा करेंगे। फिर श्री कार्णिक चले गये और जिला मजिस्ट्रेट के साथ लौटे, जिला मजिस्ट्रेट ने मुझे बताया कि स्पृश्य हिन्दुओं द्वारा मेरी शर्तें मान ली गई हैं और स्पृश्य रथ को मंदिर के मुख्य द्वार तक लायेंगे और जब वे रथ को द्वार से 10 फुट दूर तक खींच चुके होंगे, तब अस्पृश्य लोग शामिल हो सकते हैं और फिर वे स्पृश्यों के साथ मिलकर रथ पर बंधी रस्सियों को पकड़कर खींच सकते हैं और फिर उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मुझे रथ-यात्रा पर कोई एतराज है, जिस पर मैंने जवाब दिया कि “मुझे कोई एतराज नहीं है” और शांति बनाये रखने के उद्देश्य से मैंने 5,000 अस्पृश्यों में से 50 अस्पृश्यों का चयन किया और उन्हें बताया कि केवल उन्हें ही रथ खींचने में हिस्सा लेना है। जैसा कि तय हुआ था, रथ को स्पृश्यों द्वारा मंदिर के द्वार से बाहर लाया गया। लेकिन स्पृश्यों ने, जो कि अस्पृश्यों तथा पुलिस अधिकारियों, दोनों की ही आँखों में धूल झोंकना चाहते थे, दो चीजें कीं-
(1) स्पृश्यों ने रस्सियाँ इतने पास-पास खड़े होकर पकड़ रखी थीं, कि अस्पृश्यों के लिये इसमें शामिल होकर रस्सियाँ खींचने के लिये बीच में कोई जगह ही नहीं थी और (2) मंदिर के द्वार से बाहर निकलने के बाद रुकने की बजाय, जैसा कि तय हुआ था, स्पृश्यों ने रथ को लेकर भागना शुरू कर दिया जिससे अस्पृश्यों को रस्सियाँ पकड़ने और रथ-यात्रा में हिस्सा लेने का मौका ही न मिले। क़रार की सबसे महत्त्वपूर्ण शर्त के इस उल्लंघन के कारण अस्पृश्यों की भावनायें स्वाभाविक रूप से भड़क गईं। लेकिन तात्कालिक झगड़े का कारण पुलिस सिपाहियों द्वारा की गई कार्रवाई थी जिनमें से अधिकांश हिंदू थे। उन्होंने तत्काल उन अस्पृश्यों पर हमला करना शुरू कर दिया, जो थोड़ी-सी रस्सी पकड़ पाने के लिये संघर्ष कर रहे थे। झगड़ा उच्च जातीय हिन्दू पुलिस द्वारा शुरू किया गया था, जिसने खुलकर स्पृश्य हिन्दुओं की तरफ़दारी की।
इस प्रकार 50 अस्पृश्यों के दल को दो तरफ से आक्रमण झेलना पड़ा। एक तो स्पृश्य हिन्दू जिन्होंने रस्सियाँ पकड़ रखी थीं, अस्पृश्यों को धक्का दे रहे थे जिससे वे रस्सियों के पास खड़े न हो सकें और जब अस्पृश्य रस्सियों के पास खड़े होने की जगह बनाने के लिये संघर्ष कर रहे थे, तो उच्च सवर्ण हिन्दू पुलिस अपने डण्डे और राइफल के बट से उन पर वार कर रही थी।