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अपने आदमियों पर इस तरह हमला होता देख बाकी अस्पृश्यों ने रथ का पीछा करना शुरू किया, जिसे लेकर स्पृश्यों का दल बेहद तेज रफ्तार से भाग रहा था। यह देखकर कि रथ के पीछे दौड़ी चली आ रही अस्पृश्यों की भीड़ रथ के काफी करीब पहुँच चुकी है, स्पृश्यों ने रथ को सड़क पर ही छोड़ दिया और पास के खेत में भाग गये। वहाँ से उन्होंने सड़क पर खड़ी अस्पृश्यों की भीड़ पर पत्थर बरसाने शुरू कर दिये।
सड़क पर एक तरफ कँटीली तारें थीं और दूसरी तरफ कैक्टस के पौधों की कतारें, अतः अस्पृश्य पत्थरों की इस बारिश से बचकर भाग नहीं सके और परिण् ामस्वरूप, उनमें से कई घायल हो गये। अस्पृश्यों का शांतिपूर्ण व्यवहार इस तथ्य से स्पष्ट है कि स्पृश्य हिंदुओं में एक के भी हताहत होने का समाचार नहीं है।
दुष्टता की सीमा :- स्पृश्यों का झुंड जिस खेत से अस्पृश्यों पर पत्थर बरसा रहा था, वहाँ से वह सत्याग्रह समिति के कैम्प में पहुँचा, उन्होंने शामियाने गिरा दिये, स्वयंसेवकों की साइकिलें तोड़ दीं, समिति के एक सदस्य की मोटर पर पत्थर फेंके और रसोई घर में काम कर रही स्त्रियों पर पत्थर बरसाये तथा आसपास घूम-फिर रहे बच्चों को चोटें लगाईं।
वहाँ से स्पृश्यों का यह गुट नदी के किनारे पहुँचा, जहाँ इन्हें कुछ अस्पृश्य पुरुष, स्त्रियाँ व बच्चे मिले। ये अस्पृश्य नदी के तट से अस्पृश्यों के प्रमुख दल में शामिल होने नहीं जा सके थे, क्योंकि इनकी बैलगाडि़याँ संभालने वाला कोई नहीं था। इन्हें स्पृश्यों ने बहुत बेरहमी से मारा-पीटा, इनकी चीजें़ जला डालीं और कुछ को पानी में फेंक दिया।
मुझे मिली सूचना के अनुसार इस हमले में एक व्यक्ति की मौत हो गई है। नदी के तट पर इन बदनसीब अस्पृश्यों को बहुत कम सहायता प्राप्त हो पाई। अस्पृश्यों का प्रमुख दल इन्हें बचाने नहीं जा सका क्योंकि उन्हें अपनी जगह से हिलने से रोक दिया गया और उनके आसपास पुलिस का घेरा लगवा दिया गया और क्योंकि अधिकांश पुलिस-कर्मी द्वार पर अस्पृश्यों के प्रमुख दल को हिरासत में रखने में व्यस्त थे, अतः नदी-तट पर हमले का शिकार हुए अस्पृश्यों को मदद देने के लिये केवल कुछ ही पुलिस-कर्मी बचे थे।
पुलिस का रवैया :- मैं ऐसा कोई भी संकेत नहीं देना चाहता कि मुझे पुलिस अधिकारियों से कोई शिकायत है। इसके विपरीत, मुझे यह कहने में ज़रा भी संकोच नहीं है, कि उन्होंने अपना कर्त्तव्य निभाया है। मैं खास तौर पर इंस्पेक्टर शेल्के, नागरकर और कराका का नाम लेना चाहूँगा कि उन्होंने सत्याग्रह से उत्पन्न हुई अत्यंत कठिन परिस्थितियों में शानदार काम किया है।